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आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने विभाजन मुकदमे में बेटी को बराबर हिस्से के दावे पर प्रारंभिक डिक्री में संशोधन पर विचार किया

Shivam Y.

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आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने विभाजन मुकदमे में बेटी को बराबर हिस्से के दावे पर प्रारंभिक डिक्री में संशोधन पर विचार किया
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आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक पुराने पारिवारिक संपत्ति विवाद में सुनवाई करते हुए कहा कि यदि किसी बंटवारा वाद में अंतिम डिक्री अभी तक पारित नहीं हुई है, तो कानून में बाद में हुए बदलावों को ध्यान में रखते हुए प्रारंभिक डिक्री (Preliminary Decree) में संशोधन पर विचार किया जा सकता है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकार कानून में बेटियों को मिले समान अधिकारों का प्रभाव लंबित विभाजन मामलों पर पड़ सकता है।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद वर्ष 1988 में दायर एक पारिवारिक बंटवारा मुकदमे से जुड़ा है। मामला वैले मरेप्पा की संपत्ति के बंटवारे को लेकर था। शुरुआती सुनवाई में ट्रायल कोर्ट ने केवल विधवा को हिस्सा दिया था, जबकि बेटी मंडलेम वीरम्मा @ एरम्मा को कोई हिस्सा नहीं मिला था।

बाद में वर्ष 2003 में हाईकोर्ट ने उस आदेश में संशोधन करते हुए विधवा, बेटी और बेटे को बराबर हिस्सा देने का निर्देश दिया। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन विशेष अनुमति याचिका (SLP), रिव्यू और क्यूरेटिव याचिकाएं खारिज होने के बाद प्रारंभिक डिक्री अंतिम रूप से कायम रही।

कई वर्षों बाद, लंबित अंतिम डिक्री की कार्यवाही के दौरान, पुत्री और उसके कानूनी वारिसों के माध्यम से अधिकार का दावा करने वाले खरीदारों ने प्रारंभिक डिक्री में संशोधन की मांग की। उन्होंने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 में 2005 में किए गए संशोधन और विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला दिया, जिसमें पुत्रियों को पैतृक संपत्ति में समान अधिकारों के साथ सहदायिक के रूप में मान्यता दी गई थी।

न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति बालाजी मेदामल्ली की खंडपीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के विनीता शर्मा फैसले के अनुसार बेटियों को भी पुत्रों के समान सहभाजक (coparcener) अधिकार प्राप्त हैं।

पीठ ने यह भी कहा कि केवल प्रारंभिक डिक्री पारित हो जाने से बेटी का दावा समाप्त नहीं हो जाता, यदि अंतिम बंटवारा अभी बाकी है।

अदालत ने कहा कि विभाजन संबंधी मामलों में परिस्थितियां बदलने पर एक से अधिक प्रारंभिक डिक्री पारित की जा सकती हैं। अदालत ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का भी उल्लेख किया।

सुनवाई के दौरान यह दलील भी दी गई कि पिता की मृत्यु 1956 से पहले हुई थी, इसलिए संशोधित कानून लागू नहीं होगा। हालांकि, अदालत ने कहा कि संशोधित धारा 6 की व्याख्या करते समय केवल पिता की मृत्यु की तारीख निर्णायक नहीं मानी जा सकती।

हाईकोर्ट ने मामले में यह विचार किया कि क्या वर्ष 2003 की प्रारंभिक डिक्री में संशोधन की आवश्यकता है, ताकि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की संशोधित धारा 6 और विनीता शर्मा फैसले के सिद्धांतों को लागू किया जा सके।

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मामले में अंतिम डिक्री की कार्यवाही अभी लंबित है।

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