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केरल हाईकोर्ट ने अमेरिका में बने पावर ऑफ अटॉर्नी की मान्यता आंशिक रूप से रद्द की, सही दस्तावेज़ के साथ वादी को दी मुकदमा जारी रखने की छूट

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केरल हाईकोर्ट ने अमेरिका में बने पावर ऑफ अटॉर्नी की मान्यता आंशिक रूप से रद्द की, सही दस्तावेज़ के साथ वादी को दी मुकदमा जारी रखने की छूट
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केरल हाईकोर्ट ने O.P (C) No. 3213 of 2018 में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया जिसमें अमेरिका में बने पावर ऑफ अटॉर्नी को मान्यता दी गई थी। यह फैसला जस्टिस के. बाबू ने 31 जुलाई 2025 को सुनाया।.

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80 वर्षीय वादी मारग्रेट @ थांकम ने अपने पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के माध्यम से पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे और एक गिफ्ट डीड को अमान्य घोषित कराने के लिए सिविल मुकदमा दायर किया था। इस मुकदमे में प्रतिवादी नंबर 1 ने कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर की धाराओं 6(16), 7(11) और 151 के तहत आवेदन देकर यह दलील दी कि अमेरिका के मिसौरी राज्य में बना पावर ऑफ अटॉर्नी भारत में मान्य नहीं है।

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ट्रायल कोर्ट ने इस आपत्ति को खारिज कर दिया और वादी को उक्त दस्तावेज़ के आधार पर मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी। इसी आदेश को चुनौती देने के लिए प्रतिवादी हाईकोर्ट पहुँचा।

जब तक किसी विदेशी देश को नोटरीज एक्ट की धारा 14 के अंतर्गत 'पारस्परिक देश' (reciprocating country) के रूप में भारत सरकार द्वारा अधिसूचित नहीं किया जाता, तब तक वहां का नोटरी पब्लिक द्वारा किया गया कार्य भारत में मान्य नहीं माना जा सकता, हाईकोर्ट ने कहा।

वादिनी का पावर ऑफ अटॉर्नी 13 अप्रैल 2018 को अमेरिका के सेंट लुईस काउंटी, मिसौरी में निष्पादित हुआ था। प्रतिवादी ने तीन आधारों पर आपत्ति उठाई—पहचान की पुष्टि नहीं हुई, मिसौरी को भारत में मान्यता प्राप्त देश घोषित नहीं किया गया है, और दस्तावेज़ पर आवश्यक स्टांपिंग नहीं की गई है। हालांकि, वरिष्ठ अधिवक्ता ने बहस के दौरान सिर्फ दूसरे बिंदु को आगे बढ़ाया।

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हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नोटरीज एक्ट की धारा 14 केंद्र सरकार को यह अधिकार देती है कि किसी देश को अधिसूचना द्वारा यह मान्यता दी जाए कि वहां किया गया नोटराइज्ड दस्तावेज़ भारत में मान्य होगा। लेकिन मिसौरी राज्य के संदर्भ में ऐसी कोई अधिसूचना जारी नहीं की गई है। इस कारण से इंडियन एविडेंस एक्ट की धारा 85 के तहत कोई वैधता की धारणा (presumption of validity) नहीं मानी जा सकती।

किसी विदेशी देश में निष्पादित पावर ऑफ अटॉर्नी के संदर्भ में यदि वह देश 'पारस्परिक देश' न हो, तो उस दस्तावेज़ को भारत में स्वतः मान्यता नहीं मिल सकती, कोर्ट ने टिप्पणी की।

वादिनी की ओर से कुछ पुराने फैसलों जैसे जुगराज सिंह बनाम जसवंत सिंह और अब्दुल जब्बार बनाम द्वितीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश का हवाला दिया गया। लेकिन कोर्ट ने कहा कि इन मामलों में नोटरीज एक्ट की धारा 14 पर गहराई से विचार नहीं किया गया था। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की उस राय से असहमति जताई जिसमें बिना अधिसूचना के दस्तावेज़ों को मान्य मानने की बात कही गई थी।

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हालाँकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल दस्तावेज़ की वैधता पर आपत्ति के आधार पर पूरी याचिका खारिज नहीं की जा सकती।

“वादी को यह स्वतंत्रता दी जाती है कि वह एक वैध रूप से निष्पादित पावर ऑफ अटॉर्नी प्रस्तुत करे और मुकदमा आगे बढ़ाए,” कोर्ट ने निर्देश दिया।

नतीजतन, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश के उस हिस्से को रद्द कर दिया जिसमें पावर ऑफ अटॉर्नी को स्वीकार किया गया था, लेकिन मुकदमे की प्रगति की अनुमति वैध दस्तावेज़ प्रस्तुत करने की शर्त पर दी।

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