एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के निजी स्कूलों की वित्तीय स्थिति का आकलन करने के लिए दो सदस्यीय समिति का गठन किया है। यह निर्णय उन चुनौतियों के जवाब में आया है जो इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस निर्देश के खिलाफ दायर की गई थीं, जिसमें स्कूलों को COVID-19 महामारी (2020-21 सत्र) के दौरान ली गई अतिरिक्त फीस का 15% वापस करने या समायोजित करने का आदेश दिया गया था।
यह समिति, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस (सेवानिवृत्त) जीपी मित्तल और चार्टर्ड अकाउंटेंट अधीश मेहरा करेंगे, प्रत्येक स्कूल की वित्तीय स्थिति की जांच करने का कार्य करेगी, ताकि इस आदेश को लागू करने से पहले उनकी वित्तीय मजबूती का सही आकलन किया जा सके।
मामले की पृष्ठभूमि
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस आदेश को चुनौती देने के लिए 17 निजी स्कूलों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उन्होंने तर्क दिया कि एक सामान्य आदेश जारी करना उचित नहीं है क्योंकि महामारी के दौरान कई स्कूलों को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा। स्कूलों का कहना था कि वे बिना अधिशेष धनराशि (surplus funds) के काम कर रहे थे, कर्मचारियों के वेतन में कटौती करनी पड़ी, और गंभीर वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट ने इन चिंताओं को स्वीकार किया, जहां मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने कहा:
"हाईकोर्ट का आदेश बहुत व्यापक है; यह संभव नहीं है। हर मामले की अलग-अलग जांच होनी चाहिए।"
शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जहां शुल्क अधिक लिया गया हो, वहां उसे वापस किया जाना चाहिए, लेकिन प्रत्येक संस्थान की वित्तीय स्थिरता का मूल्यांकन करना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस समिति को निम्नलिखित कार्य सौंपे हैं:
- संबंधित स्कूलों के वित्तीय रिकॉर्ड की गहन जांच करना।
- प्रत्येक स्कूल की वित्तीय स्थिति का विस्तृत अध्ययन कर रिपोर्ट प्रस्तुत करना।
- न्यायमूर्ति मित्तल और अधीश मेहरा द्वारा स्कूलों के वित्तीय दस्तावेजों का विश्लेषण करना।
अदालत के आदेश के अनुसार:
"इस मुद्दे के समाधान के लिए प्रत्येक मामले में तथ्यों और खातों की जांच आवश्यक है। इस परिस्थिति में, हम न्यायमूर्ति जीपी मित्तल और सीए अधीश मेहरा की एक समिति नियुक्त करते हैं, जो स्कूलों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा कर रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी।"
Read Also:- सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्णय: प्रत्येक मामले में एफआईआर से पहले प्रारंभिक जांच अनिवार्य नहीं
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने पारदर्शिता और प्रक्रिया की दक्षता सुनिश्चित करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश भी दिए हैं:
- स्कूलों को अपनी बैलेंस शीट और आयकर रिटर्न सहित सभी आवश्यक वित्तीय दस्तावेज तीन सप्ताह के भीतर प्रस्तुत करने होंगे।
- अभिभावक संघों (Parents' Associations) को समिति के समक्ष अपनी बात रखने का अवसर दिया जाएगा।
- समिति को चार महीनों के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।
- स्कूलों को मूल्यांकन की लागत वहन करनी होगी—न्यायमूर्ति मित्तल के लिए प्रति स्कूल ₹1 लाख और सीए मेहरा के लिए ₹75,000 का शुल्क।
- जब तक समिति की रिपोर्ट नहीं आ जाती, तब तक स्कूलों को फीस वापसी पर अंतरिम रोक जारी रहेगी।
हाईकोर्ट का निर्णय और मिसाल
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने पिछले फैसले में निजी स्कूलों को महामारी के दौरान ली गई फीस का 15% वापस करने का निर्देश दिया था। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट के "इंडियन स्कूल, जोधपुर बनाम राजस्थान राज्य" मामले में दिए गए निर्णय को आधार बनाया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि जब पूरी सेवाएँ प्रदान नहीं की गई थीं, तो पूरी फीस वसूलना शिक्षा का व्यवसायीकरण (commercialization) और अनुचित लाभ (profiteering) है।
"यदि किसी छात्र से सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'इंडियन स्कूल केस' में निर्धारित फीस से अधिक वसूली गई है, तो उसे भविष्य की फीस में समायोजित किया जाए। जो छात्र स्कूल छोड़ चुके हैं, उन्हें दो महीने के भीतर अतिरिक्त राशि लौटाई जाए।"
यह आदेश उत्तर प्रदेश के कई अभिभावकों द्वारा दायर याचिकाओं के परिणामस्वरूप आया था, जिन्होंने दावा किया था कि स्कूलों ने लॉकडाउन के दौरान कुछ सुविधाएँ प्रदान नहीं की थीं, फिर भी पूरी फीस वसूल की गई थी।
Read Also:- केवल चेक बाउंस होना धारा 138 एनआई अधिनियम के तहत अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी स्थिति स्पष्ट की
सुप्रीम कोर्ट द्वारा समिति का गठन इस मुद्दे की जटिलता को दर्शाता है। एक तरफ अभिभावक महामारी के दौरान अतिरिक्त वसूली गई फीस से राहत चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर निजी स्कूलों का तर्क है कि वे गंभीर वित्तीय संकट से गुजरे, जिससे वेतन में कटौती और अन्य कठिनाइयाँ झेलनी पड़ीं।
समिति की रिपोर्ट यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी कि क्या स्कूलों को फीस का एक हिस्सा लौटाना चाहिए, या फिर उनकी वित्तीय कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए शुल्क बरकरार रखा जा सकता है। जब तक समिति की रिपोर्ट नहीं आती, तब तक सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश लागू रहेगा और फीस वापसी पर रोक जारी रहेगी।
यह मामला शैक्षणिक संस्थानों और अभिभावकों के अधिकारों के बीच संतुलन साधने के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा और भविष्य में इस प्रकार के विवादों में कानूनी और वित्तीय विशेषज्ञता की आवश्यकता को रेखांकित करेगा।
केस विवरण: इंडिपेंडेंट स्कूल फेडरेशन ऑफ इंडिया बनाम आदर्श भूषण | एसएलपी (सी) संख्या 011388 - / 2023