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सड़क हादसे में पैर गंवाने वाले राजमिस्त्री को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, मुआवजा बढ़ाकर ₹40.29 लाख; कार्य क्षमता की हानि 100% मानी गई

Zaved Khan

सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटना में पैर गंवाने वाले एक राजमिस्त्री को बड़ी राहत देते हुए कहा कि उसकी कार्य क्षमता पूरी तरह समाप्त हो गई है और मुआवजा बढ़ाकर ₹40.29 लाख कर दिया। - M. Paramesh v. VRL Logistics Ltd. and Another

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सड़क हादसे में पैर गंवाने वाले राजमिस्त्री को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, मुआवजा बढ़ाकर ₹40.29 लाख; कार्य क्षमता की हानि 100% मानी गई
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सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में सड़क दुर्घटना के शिकार हुए एक राजमिस्त्री को दी गई क्षतिपूर्ति (मुआवजा) में बड़ी बढ़ोतरी की है। अदालत ने माना कि घुटने के ऊपर पैर कट जाने के कारण वह अपने पेशे को जारी रखने में पूरी तरह असमर्थ हो गया है। इसी आधार पर कोर्ट ने उसका कुल मुआवजा बढ़ाकर ₹40.29 लाख कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला 18 अप्रैल 2017 की एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। एम. परमेश अपनी साइकिल से नमक्कल-सेलम राष्ट्रीय राजमार्ग पर जा रहे थे, तभी पीछे से आए एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी। दुर्घटना में उनके सिर, जबड़े, आंख और दाहिने पैर में गंभीर चोटें आईं। बाद में उनके दाहिने पैर को घुटने के ऊपर से काटना पड़ा।

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परमेश ने मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे का दावा किया। उनका कहना था कि वह राजमिस्त्री के रूप में काम करते थे और इसी काम से परिवार का भरण-पोषण करते थे। चिकित्सा प्रमाणपत्र में उनकी स्थायी शारीरिक विकलांगता 70 प्रतिशत आंकी गई थी।

अदालत की टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण और मद्रास हाई कोर्ट ने केवल 70 प्रतिशत शारीरिक विकलांगता के आधार पर उनकी आय क्षमता में कमी का आकलन किया था। अदालत ने कहा कि केवल शारीरिक विकलांगता का प्रतिशत देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि चोट का व्यक्ति के रोजगार और आजीविका पर क्या प्रभाव पड़ा है।

पीठ ने कहा,

“स्थायी विकलांगता वाले मामलों में मुआवजे का निर्धारण केवल शारीरिक विकलांगता के प्रतिशत को आर्थिक नुकसान का प्रतिशत मानकर नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने कहा कि राजमिस्त्री का काम पूरी तरह शारीरिक श्रम पर आधारित होता है और दोनों पैरों का सामान्य उपयोग इसमें आवश्यक है। ऐसे में घुटने के ऊपर पैर कट जाने के बाद परमेश के लिए अपना पेशा जारी रखना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं रह गया था।

अदालत ने कहा,

“दाहिने पैर के घुटने के ऊपर कट जाने से अपीलकर्ता को केवल शारीरिक विकलांगता नहीं हुई, बल्कि वह उस श्रम आधारित कार्य को प्रभावी ढंग से करने में भी असमर्थ हो गया जो उसकी आजीविका का एकमात्र साधन था।”

मुआवजे का पुनर्मूल्यांकन

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि हाई कोर्ट द्वारा भविष्य की आय की गणना में त्रुटि हुई थी। इसके अलावा कुछ मदों में दी गई राशि अंतिम गणना में शामिल नहीं की गई थी।

अदालत ने मासिक आय ₹12,000 मानते हुए, 40 प्रतिशत भविष्य की आय वृद्धि और 17 के गुणक को लागू किया। साथ ही, कार्यात्मक विकलांगता (Functional Disability) को 70 प्रतिशत के बजाय 100 प्रतिशत माना। कृत्रिम पैर और भविष्य के चिकित्सा खर्चों के लिए दी गई राशि भी ₹1 लाख से बढ़ाकर ₹2 लाख कर दी गई।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए मद्रास हाई कोर्ट के फैसले में संशोधन किया और कुल मुआवजा ₹23.86 लाख से बढ़ाकर ₹40.29 लाख कर दिया। अदालत ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह छह सप्ताह के भीतर बढ़ी हुई राशि अधिकरण के समक्ष जमा करे। यह राशि हाई कोर्ट द्वारा निर्धारित ब्याज दर के साथ देय होगी।

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Case Details:

Case Title: M. Paramesh v. VRL Logistics Ltd. and Another

Case Number: Civil Appeal No. 8708 of 2026 (arising out of SLP (Civil) No. 35337 of 2025)

Judge: Justice Prashant Kumar Mishra and Justice N.V. Anjaria

Decision Date: June 23, 2026

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