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जाली भूमि अभिलेख मामले में सुप्रीम कोर्ट ने घटाई जेल की सजा, भुगती गई अवधि को माना पर्याप्त

Zaved Khan
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सुप्रीम कोर्ट ने जाली भूमि अभिलेख के उपयोग से जुड़े मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन घटना की पुरानी प्रकृति और अन्य परिस्थितियों को देखते हुए सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया। - Israfil @ Pappu @ Naimuddin Khan v. State of Madhya Pradesh

जाली भूमि अभिलेख मामले में सुप्रीम कोर्ट ने घटाई जेल की सजा, भुगती गई अवधि को माना पर्याप्त

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के एक व्यक्ति को बड़ी राहत देते हुए उसकी जेल की सजा कम कर दी है, जिसे अदालत में जाली भूमि अभिलेख प्रस्तुत करने के मामले में दोषी ठहराया गया था। हालांकि, अदालत ने उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा और स्पष्ट किया कि न्यायिक कार्यवाही में जाली दस्तावेजों का उपयोग गंभीर अपराध माना जाता है।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला वर्ष 2014 का है। अभियोजन के अनुसार, आरोपी रीवा की एक अदालत में एक अन्य अभियुक्त के लिए जमानतदार बनने पहुंचा था। इस दौरान उसने एक भू-अधिकार ऋण पुस्तिका प्रस्तुत की।

दस्तावेजों की जांच के दौरान न्यायिक मजिस्ट्रेट को उसमें कुछ असामान्यताएं दिखाई दीं। पृष्ठों के क्रम में गड़बड़ी मिलने पर दस्तावेज की सत्यता पर संदेह हुआ और मामले की जांच के निर्देश दिए गए।

जांच के बाद पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की और आरोप लगाया कि प्रस्तुत किया गया भूमि अभिलेख जाली था तथा उसे वास्तविक दस्तावेज के रूप में अदालत में इस्तेमाल किया गया।

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ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468 और 471 के तहत दोषी ठहराते हुए पांच-पांच वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सुनवाई केवल सजा की अवधि तक सीमित थी। दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी गई थी।

पीठ ने कहा कि अदालतों में जाली दस्तावेजों का उपयोग न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा प्रभाव डालता है और ऐसे मामलों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

पीठ ने कहा,

“अदालत के समक्ष जाली दस्तावेजों का उपयोग किसी भी दृष्टि से साधारण नहीं माना जा सकता।”

हालांकि, न्यायालय ने यह भी कहा कि सजा तय करते समय अपराध की प्रकृति के साथ-साथ मामले की परिस्थितियों पर भी विचार करना आवश्यक है।

अदालत ने ध्यान दिया कि घटना को दस वर्ष से अधिक समय बीत चुका है और रिकॉर्ड पर ऐसा कोई तथ्य नहीं है जिससे यह पता चले कि आरोपी आदतन अपराधी है। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि संदिग्ध दस्तावेज प्रारंभिक जांच में ही पकड़ लिया गया था और उससे कोई अपूरणीय आर्थिक या संपत्ति संबंधी नुकसान नहीं हुआ।

पीठ ने कहा,

“सजा निर्धारित करते समय अनुपातिकता का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है।”

फैसला

सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने माना कि न्याय के हित में सजा में संशोधन किया जाना उचित होगा।

अदालत ने आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन उसकी सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया। ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाया गया जुर्माना यथावत रखा गया।

इसके साथ ही न्यायालय ने निर्देश दिया कि यदि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है और जुर्माने का भुगतान कर चुका है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।

इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सजा में राहत प्रदान की।

Case Details:

Case Title: Israfil @ Pappu @ Naimuddin Khan v. State of Madhya Pradesh

Case Number: Criminal Appeal No. 3081 of 2026 (Arising out of SLP (Crl.) No. 19486 of 2025)

Judge: Justice Prashant Kumar Mishra and Justice N.V. Anjaria

Decision Date: June 23, 2026

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