Logo

मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में ITR के आधार पर आय तय करने का कोई तयशुदा फार्मूला नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Zaved Khan

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में आय का निर्धारण किसी तयशुदा फार्मूले से नहीं किया जा सकता और मृतक के व्यवसाय की प्रकृति को भी ध्यान में रखना होगा। - Rashmirekha Tripathy and Anr. v. The Branch Manager (Legal Claims), Sriram General Insurance Company Limited and Ors.

मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में ITR के आधार पर आय तय करने का कोई तयशुदा फार्मूला नहीं: सुप्रीम कोर्ट
Join Telegram

सुप्रीम कोर्ट ने मोटर वाहन दुर्घटना मुआवजा मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि मृतक की आय का निर्धारण केवल आयकर रिटर्न (ITR) के आधार पर किसी तयशुदा फार्मूले से नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ITR महत्वपूर्ण दस्तावेज जरूर है, लेकिन यदि मृतक स्वरोजगार या व्यवसाय से जुड़ा था तो उसके व्यवसाय की प्रकृति, विकास की संभावना और अन्य परिस्थितियों पर भी विचार किया जाना चाहिए, ताकि पीड़ित परिवार को "न्यायसंगत और उचित मुआवजा" मिल सके।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस सिद्धांत को लागू करते हुए मृतक व्यवसायी के परिवार को मिलने वाले मुआवजे को ओडिशा हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित ₹1.87 करोड़ से बढ़ाकर ₹1.97 करोड़ कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 29 मई 2018 को हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। मनोरंजन पांडेय (39 वर्ष) अपनी कार से ब्रह्मपुर से भुवनेश्वर जा रहे थे। राष्ट्रीय राजमार्ग पर कालियाबली चक्का के पास एक ट्रक ने कथित रूप से लापरवाही और तेज गति से वाहन चलाते हुए उनकी कार को टक्कर मार दी। गंभीर रूप से घायल होने के बाद इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। घटना के संबंध में ट्रक चालक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई।

मृतक की पत्नी और अन्य कानूनी वारिसों ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT), ब्रह्मपुर के समक्ष ₹2.25 करोड़ मुआवजे का दावा किया। उनका कहना था कि मनोरंजन पांडेय अपना निर्माण (कंस्ट्रक्शन) व्यवसाय चलाते थे, उनकी वार्षिक आय लगभग ₹15 लाख थी और वही परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे।

अधिकरण ने आकलन वर्ष 2018-19 की ITR के आधार पर उनकी वार्षिक आय ₹15 लाख मानते हुए 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित ₹2,27,00,064 का मुआवजा प्रदान किया।

इस आदेश को बीमा कंपनी ने ओडिशा हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने दो वर्षों की ITR का औसत निकालकर मृतक की वार्षिक आय ₹13,33,226 मानी, गुणक (Multiplier) 15 लागू किया और मुआवजे की राशि घटाकर ₹1,87,75,150 कर दी।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि मोटर दुर्घटना मुआवजा तय करते समय मृतक की आय का आकलन केवल पिछले वर्ष की ITR से किया जाए या पिछले दो या तीन वर्षों की ITR का औसत लिया जाए।

मामले के व्यापक महत्व को देखते हुए अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता जे.आर. मिधा और अधिवक्ता सलील पॉल को एमिकस क्यूरी (न्यायालय की सहायता के लिए नियुक्त विधि विशेषज्ञ) के रूप में नियुक्त किया। दोनों ने अदालत को बताया कि अलग-अलग अदालतें ITR के आधार पर आय निर्धारित करने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाती रही हैं, जिससे एकरूपता नहीं है।

पीठ ने दोहराया कि मोटर वाहन अधिनियम का उद्देश्य पीड़ित परिवार को "न्यायसंगत और उचित मुआवजा" उपलब्ध कराना है।

अदालत ने कहा,

"मृतक या दावेदार की वार्षिक आय निर्धारित करने के लिए कोई कठोर या तयशुदा फार्मूला नहीं हो सकता।"

पीठ ने आगे कहा कि वेतनभोगी और स्वरोजगार/व्यवसाय करने वाले व्यक्तियों के मामलों में अलग दृष्टिकोण अपनाना होगा।

अदालत के अनुसार, वेतनभोगी कर्मचारियों के मामले में सामान्यतः पिछले वर्ष की ITR पर्याप्त होगी क्योंकि पदोन्नति या वेतन वृद्धि का प्रभाव उसी वर्ष के रिटर्न में दिखाई देता है।

वहीं, स्वरोजगार या व्यवसाय करने वाले व्यक्तियों के मामले में पिछले तीन वर्षों तक की ITR का औसत एक महत्वपूर्ण आधार हो सकता है। हालांकि अदालतों को केवल औसत निकालकर निर्णय नहीं देना चाहिए। उन्हें व्यवसाय की प्रकृति, उसके विकास की गति, भविष्य की संभावनाएं, शुरुआती वर्षों में संभावित घाटा तथा अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों पर भी विचार करना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि यदि ITR मृत्यु के बाद दाखिल की गई हो तो उसे वित्तीय दस्तावेजों के साथ सावधानीपूर्वक परखा जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद दो ITR में मृतक की वार्षिक आय क्रमशः ₹11,59,882 और ₹15,06,571 दर्शाई गई थी।

चूंकि मृतक निर्माण व्यवसाय चला रहे थे, इसलिए अदालत ने माना कि केवल दोनों ITR का औसत निकालना पर्याप्त नहीं था। व्यवसाय की प्रकृति और उसकी आय में वृद्धि की संभावना को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए था।

इन परिस्थितियों में अदालत ने मृतक की वार्षिक आय ₹14 लाख निर्धारित की और उसी आधार पर मुआवजे की पुनर्गणना की। भविष्य की आय में वृद्धि (Future Prospects), व्यक्तिगत खर्च की कटौती, उपयुक्त गुणक तथा अन्य पारंपरिक मदों को जोड़ने के बाद कुल मुआवजा ₹1,97,81,505 तय किया गया।

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए ओडिशा हाईकोर्ट के आदेश में संशोधन किया और दावेदारों को देय मुआवजा ₹1,87,75,150 से बढ़ाकर ₹1,97,81,505 कर दिया। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि बढ़ी हुई राशि पर वही ब्याज देय होगा जो अधिकरण ने निर्धारित किया था। साथ ही, बीमा कंपनी को निर्देश दिया गया कि दावेदारों के बैंक विवरण प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर पूरी राशि सीधे उनके बैंक खाते में जमा की जाए।

Case Details:

Case Title: Rashmirekha Tripathy and Anr. v. The Branch Manager (Legal Claims), Sriram General Insurance Company Limited and Ors.

Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 27220 of 2024

Judge: Justice Sanjay Karol and Justice Nongmeikapam Kotiswar Singh

Decision Date: 1 July 2026

Recommended Posts