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स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट | समझौते की तारीख से ही तत्परता और इच्छा साबित करनी होगी; देरी से 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' का दावा खारिज हो सकता है: सुप्रीम कोर्ट

CB News Desk
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सुप्रीम कोर्ट ने प्रॉपर्टी से जुड़े लंबे समय से लंबित विवाद को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि खरीदार यह साबित करने में नाकाम रहा कि वह लेन-देन पूरा करने के लिए लगातार तैयार और इच्छुक था, और उसने बिना किसी ठोस वजह के देरी के बाद कोर्ट का रुख किया था। - मोहम्मद खलील (मृत) उनके कानूनी उत्तराधिकारियों और अन्य बनाम जयम्मा

स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट | समझौते की तारीख से ही तत्परता और इच्छा साबित करनी होगी; देरी से 'स्पेसिफिक परफॉर्मेंस' का दावा खारिज हो सकता है: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक पुराने संपत्ति विवाद में खरीदार की अपील खारिज करते हुए कहा है कि वह यह साबित करने में असफल रहा कि वह समझौते को पूरा करने के लिए लगातार तैयार और इच्छुक था। अदालत ने यह भी माना कि मुकदमा दायर करने में हुई लंबी देरी उसके दावे को कमजोर करती है।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जिसने ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए खरीदार के पक्ष के आदेश को रद्द कर दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद 20 दिसंबर 1990 को हुए एक संपत्ति बिक्री समझौते से जुड़ा है। समझौते के अनुसार, प्रतिवादी ने 100 फीट × 78 फीट के एक खाली भूखंड को ₹3 लाख में बेचने पर सहमति दी थी। खरीदार ने ₹25,000 बतौर अग्रिम राशि दी थी, जबकि शेष ₹2.75 लाख रजिस्ट्री के समय चुकाने थे।

खरीदार का कहना था कि समझौते के बाद उसे संपत्ति से जुड़े मूल दस्तावेज भी सौंप दिए गए थे। बाद में दोनों पक्षों के बीच पहुंच मार्ग (एप्रोच रोड) और शहरी भूमि सीमा कानून (ULCRA) के तहत आवश्यक अनुमति प्राप्त करने को लेकर विवाद पैदा हो गया।

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जब सौदा पूरा नहीं हो सका, तब खरीदार ने वर्ष 1993 में विशिष्ट निष्पादन (Specific Performance) की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने 2002 में उसके पक्ष में फैसला दिया, लेकिन हाईकोर्ट ने उस आदेश को पलट दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विशिष्ट निष्पादन की राहत पाने के लिए वादी को यह साबित करना होता है कि वह शुरू से अंत तक समझौते का पालन करने के लिए तैयार और इच्छुक था।

पीठ ने स्पष्ट किया कि “तैयारी” (Readiness) का संबंध वित्तीय क्षमता से है, जबकि “इच्छुकता” (Willingness) का संबंध व्यक्ति के आचरण और व्यवहार से है। दोनों शर्तों का लगातार पूरा होना आवश्यक है।

खरीदार ने अपनी वित्तीय क्षमता साबित करने के लिए चार फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदों (FDR) का सहारा लिया। लेकिन अदालत ने पाया कि ये एफडीआर मुकदमा दायर होने के कई वर्षों बाद की थीं।

पीठ ने कहा, “धन उपलब्ध होने का प्रमाण उस समयावधि से जुड़ा होना चाहिए जब अनुबंध का पालन किया जाना था। बाद में तैयार किए गए वित्तीय दस्तावेज पर्याप्त नहीं माने जा सकते।”

अदालत ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई विश्वसनीय सबूत नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि खरीदार के पास समझौते के समय, चार महीने की तय अवधि के दौरान या मुकदमा दायर करते समय शेष बिक्री राशि उपलब्ध थी।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि शहरी भूमि सीमा कानून के तहत आवश्यक अनुमति प्राप्त करने की जिम्मेदारी केवल विक्रेता की नहीं थी। दोनों पक्षों को इस प्रक्रिया में सहयोग करना था।

रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि खरीदार ने आवश्यक हलफनामा और दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए थे, जिससे अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती।

पीठ ने कहा, “ऐसा आचरण यह दर्शाता है कि वादी अपनी निरंतर तैयारी और इच्छुकता साबित करने में विफल रहा।”

अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि विक्रेता ने अप्रैल 1991 में स्पष्ट रूप से समझौते को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया था। इसके बावजूद खरीदार ने लगभग दो वर्ष नौ महीने बाद, दिसंबर 1993 में मुकदमा दायर किया।

पीठ ने कहा कि विशिष्ट निष्पादन एक न्यायसंगत (equitable) राहत है और इसे मांगने वाले व्यक्ति को तत्परता और सावधानी दिखानी चाहिए। केवल यह तथ्य कि मुकदमा सीमा अवधि के भीतर दायर किया गया था, अपने आप राहत पाने का अधिकार नहीं देता।

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि खरीदार न तो अपनी वित्तीय तैयारी साबित कर पाया और न ही अपने व्यवहार से यह दिखा सका कि वह लगातार समझौते को पूरा करने के लिए इच्छुक था।

पीठ ने कहा, “अपीलकर्ता अपनी तैयारी और इच्छुकता दोनों साबित करने में विफल रहे हैं। साथ ही उन्होंने अदालत का दरवाजा भी पर्याप्त तत्परता के साथ नहीं खटखटाया, जिससे उन्हें विशिष्ट निष्पादन जैसी न्यायसंगत राहत नहीं दी जा सकती।”

इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

Case Details

Case Title: Mohammed Khaleel (D) Through LRs & Ors. v. Jayamma

Case Number: Civil Appeal No. 2187 of 2011

Judges: Justice Prashant Kumar Mishra and Justice N.V. Anjaria

Decision Date: June 23, 2026

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