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सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे के जन्म के बाद IPS ट्रेनिंग में देरी करने वाली 1993 की MHA पॉलिसी पर सवाल उठाए और केंद्र से जवाब मांगा।

Zaved Khan
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सुप्रीम कोर्ट ने गर्भवती IPS प्रोबेशनर्स के प्रशिक्षण पर रोक लगाने वाली 1993 की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि चिकित्सकीय रूप से फिट महिलाओं को प्रशिक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता और केंद्र से जवाब मांगा। - Urvashi Sengar v. Union of India & Anr.

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे के जन्म के बाद IPS ट्रेनिंग में देरी करने वाली 1993 की MHA पॉलिसी पर सवाल उठाए और केंद्र से जवाब मांगा।

सुप्रीम कोर्ट ने 8 July को गृह मंत्रालय (MHA) की वर्ष 1993 की उस नीति पर सवाल उठाए, जिसके तहत गर्भवती भारतीय पुलिस सेवा (IPS) प्रोबेशनर्स को प्रशिक्षण के दौरान रोक दिया जाता है। अदालत ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाई गई लाभकारी व्यवस्था का इस्तेमाल उन महिला अधिकारियों को प्रशिक्षण से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता जो चिकित्सकीय रूप से पूरी तरह फिट हों। साथ ही, अदालत ने केंद्र सरकार से यह बताने को कहा कि क्या IPS अधिकारी उर्वशी सेंगर को इस चरण पर फेज-II प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दी जा सकती है।

मामले की पृष्ठभूमि

मध्य प्रदेश कैडर की 2023 बैच की प्रत्यक्ष भर्ती IPS अधिकारी उर्वशी सेंगर ने गृह मंत्रालय के 23 अगस्त 1993 के कार्यालय ज्ञापन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। इस नीति में महिला IPS प्रोबेशनर्स को प्रशिक्षण अवधि के दौरान गर्भधारण से बचने की सलाह दी गई है। यदि प्रशिक्षण के दौरान कोई अधिकारी गर्भवती हो जाती है, तो उसका प्रशिक्षण रोक दिया जाता है और बच्चे के जन्म के एक वर्ष बाद ही उसे दोबारा प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दी जाती है।

याचिका के अनुसार, उर्वशी सेंगर ने 20 सितंबर 2025 को बच्चे को जन्म दिया। इसके बाद उन्होंने 22 जून 2026 से शुरू होने वाले फेज-II प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति मांगी। उनका कहना था कि वे चिकित्सकीय रूप से पूरी तरह फिट थीं, लेकिन 1993 की नीति का हवाला देकर अकादमी ने उनका अनुरोध अस्वीकार कर दिया।

इसके बाद उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) का रुख किया। CAT ने 27 मई 2026 के अंतरिम आदेश में आवश्यक औपचारिकताओं और चिकित्सकीय फिटनेस की शर्त पर उन्हें फेज-II प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दी। हालांकि, केंद्र सरकार ने इस आदेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी और मामला बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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अदालत की टिप्पणियां

न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि 1993 के कार्यालय ज्ञापन की व्याख्या महिलाओं के संरक्षण के उद्देश्य से की जानी चाहिए, न कि उनके अवसर सीमित करने के लिए।

पीठ ने टिप्पणी की,

"यह महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया लाभकारी प्रावधान है, न कि यदि वे प्रशिक्षण के लिए सक्षम हों तो उनका प्रशिक्षण कराने के अधिकार को छीनने के लिए।"

इसके बाद अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा,

"यदि इस कार्यालय ज्ञापन का उद्देश्य एक स्वस्थ महिला को प्रशिक्षण का अवसर देना है, तो फिर यदि वह फिट है, तो उसे प्रशिक्षण से क्यों रोका जा रहा है?"

पीठ ने यह भी कहा कि बच्चे के जन्म के बाद हर महिला की शारीरिक स्थिति और स्वास्थ्य-लाभ की अवधि अलग-अलग हो सकती है। अदालत ने संकेत दिया कि कुछ महिलाएं नौ महीने के भीतर प्रशिक्षण के लिए चिकित्सकीय रूप से सक्षम हो सकती हैं, जबकि अन्य को अधिक समय की आवश्यकता हो सकती है। इसलिए ऐसे मामलों का निर्णय किसी कठोर और एक समान नियम के बजाय व्यक्तिगत चिकित्सकीय मूल्यांकन के आधार पर किया जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि यदि इस मामले में नीति में ढील दी गई तो भविष्य में इसी तरह के अन्य दावे भी सामने आ सकते हैं। वहीं उर्वशी सेंगर की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि पहले भी अनुपमा जेम्स और आरती सिंह जैसी अधिकारियों को 1993 के कार्यालय ज्ञापन के बावजूद प्रशिक्षण जारी रखने या दोबारा शुरू करने की अनुमति दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी किया। अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से निर्देश प्राप्त करने को कहा कि क्या वर्तमान स्थिति में, जबकि फेज-II प्रशिक्षण 22 जून 2026 से शुरू हो चुका है, उर्वशी सेंगर को प्रशिक्षण में शामिल होने की अनुमति दी जा सकती है।

मामले की अगली सुनवाई 10 जुलाई 2026 के लिए निर्धारित की गई है।

Case Details:

Case Title: Urvashi Sengar v. Union of India & Anr.

Case Number: Special Leave Petition (Civil) No. 22724/2026

Judge: Justice Manoj Misra and Justice Shree Chandrashekhar

Decision Date: July 8, 2026

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