उत्तराखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 2018 के अल्मोड़ा एसिड अटैक मामले में दोषी रघुनाथ सिंह की दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि पीड़िता की उपचार के दौरान सेप्टीसीमिया (संक्रमण के पूरे शरीर में फैल जाने) से हुई मृत्यु उसी एसिड हमले में लगी गंभीर जलन का प्रत्यक्ष परिणाम थी।
खंडपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल रहा है और ट्रायल कोर्ट द्वारा भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302, 326A और 504 के तहत सुनाए गए फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील रघुनाथ सिंह द्वारा अपनी सजा के खिलाफ दायर की गई थी। अभियोजन के अनुसार 10 सितंबर 2018 को अल्मोड़ा जिले के राजस्व पुलिस क्षेत्र में रघुनाथ सिंह और उसके भाई शेर सिंह के बीच व्यक्तिगत विवाद को लेकर कहासुनी हुई। आरोप है कि विवाद के बाद रघुनाथ सिंह घर के अंदर गया, एक जेरिकैन और मग में रखा एसिड लेकर लौटा और शेर सिंह के परिवार के कई सदस्यों पर एसिड फेंक दिया।
हमले में परिवार के कई लोग झुलस गए। जया देवी और नीमा देवी को सबसे गंभीर चोटें आईं। दोनों को पहले हल्द्वानी स्थित डॉ. सुशीला तिवारी सरकारी अस्पताल और बाद में नई दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल भेजा गया। इलाज के दौरान 20 नवंबर 2018 को जया देवी की सेप्टीसीमिया के कारण मृत्यु हो गई, जिसे चिकित्सकों ने एसिड से हुई गंभीर जलन का परिणाम बताया।
इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने रघुनाथ सिंह को हत्या, एसिड अटैक और जानबूझकर अपमान करने के अपराध में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद सहित विभिन्न सजाएं सुनाईं, जिन्हें साथ-साथ चलाने का आदेश दिया गया।
हाईकोर्ट में क्या दलीलें दी गईं
अपीलकर्ता की ओर से कहा गया कि एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई, अभियोजन गवाहों के बयानों में विरोधाभास हैं और जांच में कई गंभीर खामियां हैं। यह भी तर्क दिया गया कि जया देवी की मृत्यु घटना के दो महीने से अधिक समय बाद सेप्टीसीमिया से हुई, इसलिए हत्या की धारा के तहत दोषसिद्धि टिक नहीं सकती।
वहीं राज्य सरकार ने कहा कि एफआईआर में हुई देरी पूरी तरह स्वाभाविक और स्पष्ट थी क्योंकि सभी घायल गंभीर रूप से झुलसे हुए थे और अस्पताल में उपचार करा रहे थे। राज्य ने कई घायल प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही और चिकित्सीय साक्ष्यों पर भरोसा करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले का समर्थन किया।
अदालत की टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने एफआईआर में देरी संबंधी आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि घटना के तुरंत बाद सभी पीड़ित अस्पताल में भर्ती थे और उनका इलाज चल रहा था।
अदालत ने कहा कि जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के स्वयंसेवकों के अस्पताल पहुंचने के बाद ही घायल शेर सिंह की शिकायत दर्ज कराई जा सकी।
सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि घायल प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही का विशेष महत्व होता है क्योंकि उनकी घटना स्थल पर मौजूदगी पर सामान्यतः संदेह नहीं किया जा सकता।
पीठ ने कहा,
"एफआईआर दर्ज होने में हुई देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण दिया गया है।"
इसलिए केवल देरी के आधार पर अभियोजन की कहानी पर संदेह नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी पाया कि सभी घायल गवाहों ने एक समान बयान दिया कि आरोपी पहले झगड़ा कर रहा था, फिर घर के अंदर गया, एसिड लेकर लौटा और परिवार के सदस्यों, यहां तक कि बच्चों पर भी एसिड फेंक दिया।
जांच में कथित कमियों के संबंध में अदालत ने कहा कि यदि प्रत्यक्षदर्शियों की विश्वसनीय गवाही और चिकित्सीय साक्ष्य अभियोजन के पक्ष का समर्थन करते हैं, तो केवल जांच की कुछ त्रुटियां पूरे मामले को कमजोर नहीं करतीं।
पीठ ने कहा,
"अभियोजन के गवाह एसिड हमले को लेकर पूरी तरह एकमत हैं। कुछ मामूली विसंगतियां अभियोजन के मामले पर कोई संदेह उत्पन्न नहीं करतीं।"
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि बचाव पक्ष के साक्ष्यों से भी यह तथ्य सामने आया कि घटना वाले दिन आरोपी ने शराब पी रखी थी और जेरिकैन में रखे पदार्थ से शेर सिंह के परिवार के सदस्य झुलस गए थे।
हत्या के आरोप पर अदालत का निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया कि लंबे उपचार के बाद हुई मृत्यु के कारण हत्या का अपराध नहीं बनता।
अदालत ने कहा कि चिकित्सा साक्ष्य स्पष्ट रूप से बताते हैं कि जया देवी की मृत्यु एसिड से लगी गंभीर जलन के कारण हुए संक्रमण (सेप्टीसीमिया) से हुई थी। इसलिए मृत्यु और एसिड हमले के बीच सीधा संबंध स्थापित होता है।
पीठ ने कहा कि आरोपी पहले घर के अंदर गया, एसिड लेकर लौटा और फिर जानबूझकर हमला किया। यह उसके इरादे को स्पष्ट करता है। अदालत ने यह भी कहा कि जिस तरह से एसिड का इस्तेमाल किया गया, उससे यह स्पष्ट है कि हमला बेहद क्रूर और गंभीर प्रकृति का था।
फैसला
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रघुनाथ सिंह की आपराधिक जेल अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा IPC की धारा 302, 326A और 504 के तहत सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल रहा है और ट्रायल कोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं है।
Case Details:
Case Title: Raghunath Singh v. State of Uttarakhand
Case Number: Criminal Jail Appeal No. 80 of 2022
Judge: Justice Siddhartha Sah and Justice Ravindra Maithani
Decision Date: 06 July 2026













