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व्हाट्सएप ग्रुप में राजनीतिक आलोचना को अपराध नहीं माना जा सकता: तेलंगाना हाई कोर्ट ने आरोपी को दी राहत

Shivam Y.

तेलंगाना हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति के खिलाफ व्हाट्सएप ग्रुप में किए गए राजनीतिक टिप्पणियों के आधार पर दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करते हुए कहा कि मात्र आलोचना को अपराध नहीं माना जा सकता। - गंडुरी कृष्णा बनाम तेलंगाना राज्य और अन्य

व्हाट्सएप ग्रुप में राजनीतिक आलोचना को अपराध नहीं माना जा सकता: तेलंगाना हाई कोर्ट ने आरोपी को दी राहत
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तेलंगाना हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में व्हाट्सएप ग्रुप में कथित रूप से आपत्तिजनक संदेश पोस्ट करने के आरोप में चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि किसी सार्वजनिक प्रतिनिधि की आलोचना मात्र से भारतीय दंड संहिता के तहत आरोपित अपराध स्वतः सिद्ध नहीं हो जाते।

न्यायमूर्ति के. सुजाना ने 6 अप्रैल 2026 को यह फैसला सुनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला गांदुरी कृष्णा से जुड़ा है, जिन पर आरोप था कि उन्होंने "सेव डेमोक्रेसी" नामक व्हाट्सएप ग्रुप में एक मंत्री के खिलाफ कुछ टिप्पणियां पोस्ट की थीं। अभियोजन पक्ष का कहना था कि इन संदेशों में अपमानजनक और भड़काऊ बातें थीं, जिससे भारतीय दंड संहिता की धारा 504, 505(1)(बी) और 506 के तहत अपराध बनता है।

जांच के बाद पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल किया। इसके बाद आरोपी ने ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज (मुक्ति) की मांग की, लेकिन मजिस्ट्रेट ने याचिका खारिज कर दी। इसी आदेश को चुनौती देते हुए आरोपी हाई कोर्ट पहुंचे।

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का परीक्षण किया और पाया कि आरोपी द्वारा किए गए कथित संदेश मुख्य रूप से एक सार्वजनिक प्रतिनिधि की आलोचना के रूप में दिखाई देते हैं।

अदालत ने कहा, “विशेष रूप से किसी निजी सोशल मीडिया समूह में व्यक्त की गई आलोचना मात्र से आरोपित अपराधों के आवश्यक तत्व स्वतः स्थापित नहीं होते।”

न्यायालय ने यह भी पाया कि धारा 504 के तहत आवश्यक ‘शांति भंग कराने के उद्देश्य से किया गया जानबूझकर अपमान’ रिकॉर्ड से साबित नहीं होता।

धारा 505(1)(बी) के संबंध में अदालत ने कहा कि संदेशों से ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता कि उनका उद्देश्य जनता में भय या अशांति पैदा करना था। वहीं धारा 506 के तहत आपराधिक धमकी का आरोप भी प्रथम दृष्टया स्थापित नहीं हुआ क्योंकि किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने या डराने वाली धमकी का कोई साक्ष्य नहीं था।

अदालत ने कहा कि यदि संदेशों को मानहानिकारक माना भी जाए, तब भी मामला मुख्य रूप से मानहानि का हो सकता है, जिसके लिए संबंधित व्यक्ति को कानून के अनुसार उचित कार्यवाही शुरू करनी होगी।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अभियोजन द्वारा लगाए गए आरोपों के लिए आवश्यक कानूनी आधार उपलब्ध नहीं है।

हाई कोर्ट ने माना कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर आरोपी के खिलाफ मुकदमा जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

इसी निष्कर्ष के साथ अदालत ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली और 5 जनवरी 2026 को पारित ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी की डिस्चार्ज याचिका खारिज की गई थी।

Case Details

Case Title: Ganduri Krishna v. State of Telangana & Another

Case Number: Criminal Revision Case No. 130 of 2026

Judge: Justice K. Sujana

Decision Date: 06 April 2026

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