बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने स्पष्ट किया है कि जांच के दौरान पुलिस कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया को दरकिनार नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि किसी महिला के घर की तलाशी लेना और उसका मोबाइल फोन जब्त करना तभी वैध माना जाएगा जब यह पूरी तरह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाए। मामले में अदालत ने पाया कि पुलिस ने अनिवार्य कानूनी प्रावधानों का पालन नहीं किया, जिससे महिला के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित निजता के अधिकार का उल्लंघन हुआ।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ताओं खुशबू और उनके पति इद्द्रिश खान ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया कि खापा पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध क्रमांक 26/2026 की जांच के दौरान पुलिस बार-बार उनके घर पहुंची और उन्हें परेशान किया।
याचिका के अनुसार, पति का नाम एफआईआर में नहीं होने के बावजूद पुलिस कई बार उनके घर पहुंची। आरोप था कि पुलिस बिना किसी वैध अनुमति या निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए घर में दाखिल हुई, महिला से पूछताछ की और उसका मोबाइल फोन जब्त कर लिया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि मोबाइल जब्त करते समय न तो जब्ती पंचनामा तैयार किया गया, न रसीद दी गई और न ही BNSS में निर्धारित अन्य आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन किया गया।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि पुलिस की कार्रवाई जांच का हिस्सा थी और मोबाइल फोन कानून के अनुसार जब्त कर फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया था।
अदालत की टिप्पणी
जस्टिस उर्मिला जोशी फाल्के और जस्टिस निवेदिता पी. मेहता की खंडपीठ ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि पुलिस ने BNSS की धारा 185 के तहत निर्धारित अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है जिससे यह साबित हो कि जांच अधिकारी ने बिना वारंट तलाशी लेने की आवश्यकता के कारण लिखित रूप में दर्ज किए थे या यह बताया था कि वारंट लेने में देरी होने से जांच प्रभावित होती। अदालत को केस डायरी में भी ऐसी कोई समकालीन प्रविष्टि नहीं मिली जिससे यह स्पष्ट हो कि तलाशी कानून के अनुरूप की गई थी।
मोबाइल फोन की जब्ती के संबंध में भी अदालत ने पाया कि BNSS की धारा 105 के तहत आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। अदालत के अनुसार, जब्ती पंचनामा, स्वतंत्र गवाहों की उपस्थिति, जब्ती की रसीद तथा अन्य वैधानिक औपचारिकताओं का कोई रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया।
खंडपीठ ने कहा,
"निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।"
अदालत ने आगे कहा,
"जांच एजेंसी से अपेक्षा की जाती है कि वह कानून की सीमाओं के भीतर कार्य करे और केवल जांच का उद्देश्य किसी अवैध तलाशी या जब्ती को वैध नहीं बना सकता।"
अदालत ने अपने पूर्व निर्णय Dnyaneshwar v. State of Maharashtra का भी उल्लेख करते हुए दोहराया कि बिना वारंट तलाशी लेने की शक्ति असाधारण है और इसका प्रयोग केवल कानून में निर्धारित अनिवार्य शर्तों का सख्ती से पालन करते हुए ही किया जा सकता है।
अदालत का निर्णय
हाई कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए घोषित किया कि याचिकाकर्ताओं के घर की तलाशी और याचिकाकर्ता संख्या 1 का मोबाइल फोन जब्त करने की कार्रवाई BNSS की धारा 185 और धारा 105 के अनुरूप नहीं थी, इसलिए यह कानून की दृष्टि में टिकाऊ नहीं है।
अदालत ने निर्देश दिया कि यदि मोबाइल फोन किसी लंबित जांच या न्यायिक कार्यवाही के लिए आवश्यक नहीं है, तो उसे तुरंत वापस किया जाए। साथ ही राज्य सरकार को आदेश दिया गया कि वह याचिकाकर्ता संख्या 1 को दो महीने के भीतर ₹10,000 का मुआवजा अदा करे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय करने के बाद संबंधित पुलिस अधिकारियों से यह राशि वसूल सकती है।
यदि निर्धारित अवधि में मुआवजा नहीं दिया जाता है, तो उस पर 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा।
Case Details
Case Title: Khushbu and Another v. State of Maharashtra and Another
Case Number: Criminal Writ Petition No. 128 of 2026
Judges: Justice Urmila Joshi Phalke and Justice Nivedita P. Mehta
Decision Date: 3 July 2026

















-300x169.webp)

