गुजरात हाई कोर्ट ने बुधवार को दहेज-मौत के एक 23 साल पुराने मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और माना कि मंदिर जाने को लेकर हुए छोटे से झगड़े को उस तरह की “क्रूरता” नहीं माना जा सकता, जो किसी युवा महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दे। न्यायाधीश इलेश जे वोरा और जस्टिस आर. टी. वच्छानी की डिवीजन बेंच ने नडियाद सेशंस कोर्ट के 2002 के फैसले को बरकरार रखते हुए पति और तीन ससुरालियों को आईपीसी की धारा 498A, 304B, 306 तथा अन्य आरोपों से बरी करने का आदेश कायम रखा।
पृष्ठभूमि
मामला जनवरी 1999 का है, जब थलेड़ी गांव की 22 वर्षीय महिला ने घर में हुए एक विवाद के बाद सेल्फ़ोस जहर खा लिया था। मां की शिकायत के अनुसार, पति और ससुराल पक्ष के लोगों द्वारा कथित उपेक्षा, दहेज मांग और ताने दिए जाते थे। राज्य का तर्क था कि विवाह के सात वर्ष के भीतर हुई मृत्यु अपने-आप धारा 113A (साक्ष्य अधिनियम) के तहत आत्महत्या के उकसावे की कानूनी धारणा को सक्रिय कर देती है।
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जांचकर्ताओं ने घटनास्थल से जहर का डिब्बा बरामद किया और बाद में शव को निकालकर पोस्ट-मार्टम कराया, जिसमें सेल्फ़ोस जहर से मौत की पुष्टि हुई लेकिन किसी भी तरह की ताज़ा चोट का निशान नहीं मिला। कुछ पंच गवाह मुकर गए, जबकि अन्य किसी प्रत्यक्ष उकसावे को जोड़ नहीं सके।
2002 में सेशंस कोर्ट ने सभी चार आरोपियों को बरी कर दिया, यह कहते हुए कि मृत्यु से ठीक पहले “क्रूरता” का कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है। राज्य ने इसी बरी के आदेश को धारा 378 CrPC के तहत चुनौती दी।
अदालत की टिप्पणियाँ
हाई कोर्ट ने गवाहियों, विरोधाभासों और कानूनी धाराओं का विस्तार से विश्लेषण किया।
बेंच ने कहा कि हालांकि मां और बहन ने दहेज उत्पीड़न की बातें कहीं, लेकिन उनके बयान सामान्य और असंगत थे-न तारीखें, न विशेष मांगें और न ही स्वतंत्र साक्ष्य। जस्टिस वच्छानी ने टिप्पणी की, “वैवाहिक जीवन के सामान्य उतार-चढ़ाव को धारा 498A की क्रूरता नहीं माना जा सकता, जब तक कि व्यवहार जानबूझकर न हो और इतना गंभीर न हो कि महिला को आत्महत्या की ओर धकेल दे।”
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सबसे महत्वपूर्ण बात, अदालत ने यह माना कि आत्महत्या से ठीक पहले हुआ विवाद-नडियाद के संताराम मंदिर जाने की अनुमति न देना-इतना तुच्छ था कि इसे क्रूरता नहीं कहा जा सकता। बेंच ने कहा, “सिर्फ मंदिर जाने से रोका जाना उस तरह का जानबूझा कृत्य नहीं है, जो किसी महिला को आत्महत्या के लिए प्रेरित करे।”
अदालत ने यह भी पाया कि अधूरी बयानबाज़ी (डाइंग डिक्लेरेशन), जिसमें “परिवार के दबाव” जैसा अस्पष्ट उल्लेख था, चिकित्सा प्रमाणन के बिना थी और स्वतंत्र गवाह भी नहीं थे। पति द्वारा पत्नी को तुरंत अस्पताल ले जाना भी अदालत के अनुसार उसके विरुद्ध किसी दुष्प्रेरणा को कमज़ोर करता है।
धारा 304B (दहेज मृत्यु) के संदर्भ में अदालत ने साफ कहा कि मृत्यु से ठीक पहले दहेज मांग का कोई ठोस साक्ष्य नहीं है। FIR में इसका उल्लेख तक नहीं था, बल्कि यह आरोप पहली बार कोर्ट में गवाही के दौरान सामने आया।
जहाँ तक आरोप था कि परिवार ने सबूत मिटाने के लिए जल्दबाज़ी में दफ़नाया, कोर्ट ने माना कि यह स्थानीय धार्मिक परंपराओं के अनुसार था। बाद में शव निकाला गया, पोस्ट-मार्टम हुआ और कोई छेड़छाड़ साबित नहीं हुई।
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फैसला
निष्कर्षतः, अदालत ने कहा कि अभियोजन न तो क्रूरता सिद्ध कर सका, न उकसावा, न दहेज मांग, और न ही किसी ऐसी परिस्थिति का प्रमाण दे पाया जो आत्महत्या से जुड़ सके। बेंच ने माना कि ट्रायल कोर्ट का दृष्टिकोण “यथोचित और संभव” था और अक्विटल अपील में इसे पलटा नहीं जा सकता।
राज्य की अपील खारिज की जाती है और सभी आरोपियों का बरी होना बरकरार रखा जाता है।
Case Title: State of Gujarat vs. Rajeshbhai Pitamberbhai Parmar & Others
Case Number: Criminal Appeal No. 457 of 2002
Case Type: State Appeal Against Acquittal (Criminal)
Decision Date: 19 November 2025









