मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि भरण-पोषण (मेंटेनेंस) का अर्थ केवल जीवित रहने के लिए न्यूनतम सहायता देना नहीं है, बल्कि इसमें सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है। अदालत ने पत्नी और नाबालिग बेटी को दिए गए भरण-पोषण की राशि बढ़ाते हुए कहा कि पति अपनी वैधानिक जिम्मेदारी से यह कहकर नहीं बच सकता कि वह परिवार के किसी अन्य सदस्य की शिक्षा पर खर्च कर रहा है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता पत्नी और उसकी नाबालिग बेटी ने फरवरी 2024 में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग करते हुए आवेदन दायर किया था। उनका आरोप था कि पति ने उनकी उपेक्षा की और पर्याप्त आय होने के बावजूद उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी नहीं निभाई।
दूसरी ओर, पति ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि वह अपने बड़े बेटे की इंजीनियरिंग शिक्षा पर हर वर्ष लाखों रुपये खर्च कर रहा है। उसने यह भी दावा किया कि वह परिवार की अन्य जिम्मेदारियां भी निभा रहा है।
मामले की सुनवाई के बाद फैमिली कोर्ट ने पत्नी को ₹5,000 प्रति माह और नाबालिग बेटी को ₹2,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। इस राशि को अपर्याप्त बताते हुए पत्नी और बेटी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पति की वेतन पर्ची का अवलोकन किया, जिससे पता चला कि वह एक सरकारी विद्यालय में मध्य शिक्षक के पद पर कार्यरत है और उसका मासिक शुद्ध वेतन लगभग ₹72,915 है।
अदालत ने पाया कि नाबालिग बेटी की पढ़ाई का खर्च नियमित रूप से नहीं उठाया जा रहा था। इस पर न्यायालय ने कहा,
“स्कूली शिक्षा प्राप्त कर रहे बच्चों को माता-पिता की दया पर नहीं छोड़ा जा सकता।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पति स्वेच्छा से कुछ शैक्षणिक खर्च वहन कर रहा है, तो इससे पत्नी और नाबालिग बेटी के भरण-पोषण की उसकी कानूनी जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती।
न्यायालय ने यह भी कहा,
“एक सरकारी कर्मचारी की पत्नी और बेटी को पति की कृपा के भरोसे जीवन यापन करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।”
कोर्ट ने यह भी माना कि यदि पति अपने वयस्क पुत्र की उच्च शिक्षा पर खर्च कर रहा है, तो यह नाबालिग बेटी को उचित आर्थिक सहायता देने से बचने का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने कहा कि नाबालिग बेटी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
न्यायमूर्ति गजेन्द्र सिंह ने कहा,
“भरण-पोषण की अवधारणा में सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है।”
मामले के सभी तथ्यों, पति की आय, बढ़ती महंगाई और नाबालिग बेटी की शैक्षणिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा निर्धारित राशि को अपर्याप्त माना।
अदालत ने पत्नी को दिए जाने वाले मासिक भरण-पोषण को ₹5,000 से बढ़ाकर ₹7,500 कर दिया। वहीं नाबालिग बेटी के लिए निर्धारित राशि ₹2,000 से बढ़ाकर ₹10,000 प्रति माह कर दी गई।
अदालत ने निर्देश दिया कि बढ़ी हुई राशि 22 फरवरी 2024, यानी मूल आवेदन की तारीख से देय होगी। साथ ही, पहले से जमा की गई राशि को समायोजित करने का भी आदेश दिया गया।
Case Details
Case Title: Madhu and Others v. Hemendra Kumar
Case Number: Criminal Revision No. 4655 of 2025
Judge: Justice Gajendra Singh
Decision Date: 29 May 2026





