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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकारी वकील की बर्खास्तगी को रद्द किया, उचित प्रक्रिया का पालन न होने पर उन्हें बहाल करने का आदेश दिया।

Shivam Y.

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक सरकारी वकील की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि बिना उचित विभागीय जांच और सुनवाई का मौका दिए किसी व्यक्ति की छवि खराब करने वाला (stigmatic) आदेश जारी नहीं किया जा सकता। - मनोज सिंह रघुवंशी बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकारी वकील की बर्खास्तगी को रद्द किया, उचित प्रक्रिया का पालन न होने पर उन्हें बहाल करने का आदेश दिया।
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी सरकारी वकील की सेवाएं ऐसे आरोपों के आधार पर समाप्त नहीं की जा सकतीं जो उसके पेशेवर आचरण पर दाग (Stigma) लगाते हों, जब तक कि उसके खिलाफ नियमित विभागीय जांच न कराई जाए। अदालत ने राज्य सरकार द्वारा जारी सेवा समाप्ति आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता की बहाली का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता मनोज सिंह रघुवंशी को वर्ष 2021 में शिवपुरी जिला न्यायालय में अतिरिक्त लोक अभियोजक (Additional Government Pleader) और अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता (Additional Government Advocate) नियुक्त किया गया था। वे एक हत्या के मुकदमे में राज्य की ओर से पैरवी कर रहे थे।

मुकदमे की कार्यवाही के दौरान कुछ प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के नाम प्रारंभिक गवाह सूची में शामिल नहीं हो पाए। बाद में इस त्रुटि का पता चलने पर संबंधित गवाहों को सूची में जोड़कर उनका परीक्षण कराया गया। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार को यह जांचने का निर्देश दिया कि गवाहों का नाम छूटना जानबूझकर किया गया था या केवल लापरवाही का परिणाम था।

इसके बाद विभागीय स्तर पर तथ्य-पड़ताल (Fact-Finding Inquiry) की गई और अंततः मार्च 2025 में याचिकाकर्ता की सेवाएं समाप्त कर दी गईं।

न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत ने कहा कि सेवा समाप्ति आदेश में याचिकाकर्ता पर “गंभीर लापरवाही” का आरोप लगाया गया है। इस प्रकार का आदेश व्यक्ति की प्रतिष्ठा और भविष्य की पेशेवर संभावनाओं को प्रभावित करता है, इसलिए इसे “कलंककारी” (Stigmatic) माना जाएगा।

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता को न तो कोई आरोप-पत्र (Charge-sheet) दिया गया और न ही उसके खिलाफ नियमित विभागीय जांच कराई गई। केवल तथ्य-पड़ताल रिपोर्ट के आधार पर सेवा समाप्ति का आदेश पारित कर दिया गया।

कोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रतिकूल कार्रवाई करने से पहले उसे पर्याप्त अवसर दिया जाना आवश्यक है।

अदालत ने कहा कि, “विवादित आदेश कलंककारी, कारणरहित और गैर-भाषी (Non-Speaking) है तथा इसे विधिक प्रक्रिया का पालन किए बिना पारित किया गया है।”

सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने 13 मार्च 2025 के सेवा समाप्ति आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को पुनः सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार उचित समझे तो कानून के अनुसार नई कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगी।

Case Details:

Case Title: Manoj Singh Raghuwanshi v. State of Madhya Pradesh & Others

Case Number: Writ Petition No. 12292 of 2025

Judge: Justice Anand Singh Bahrawat

Decision Date: 17 June 2026

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