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मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के अनुसार, पूर्व-संज्ञानात्मक चरण में साक्ष्य प्रस्तुत न किए जाने के आधार पर निजी शिकायत को खारिज नहीं किया जा सकता।

Shivam
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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा कि संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देना आवश्यक है, लेकिन इस चरण में सभी साक्ष्य उपलब्ध कराना अनिवार्य नहीं है। - विनय प्रकाश सिंह उर्फ ​​दीपू सिंह बनाम पुष्पेंद्र सिंह उर्फ ​​डिंपल सिंह और अन्य

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के अनुसार, पूर्व-संज्ञानात्मक चरण में साक्ष्य प्रस्तुत न किए जाने के आधार पर निजी शिकायत को खारिज नहीं किया जा सकता।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में निजी शिकायत को केवल इस आधार पर खारिज करने के मजिस्ट्रेट के फैसले को रद्द कर दिया कि शिकायतकर्ता ने प्रस्तावित आरोपियों को सभी दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराए थे। अदालत ने कहा कि कानून का ऐसा अर्थ नहीं निकाला जा सकता जिससे शिकायतकर्ता पर अनावश्यक बोझ डाला जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता विनय प्रकाश सिंह उर्फ दीपु सिंह ने एक निजी शिकायत दायर कर आरोप लगाया था कि कुछ व्यक्तियों और पुलिस अधिकारियों ने उनके फार्महाउस में प्रवेश कर उनके साथ मारपीट की, धमकियां दीं और वहां रखा डीजल अपने साथ ले गए।

शिकायत की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223(1) की व्याख्या को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। मजिस्ट्रेट ने शिकायतकर्ता को निर्देश दिया कि वह संज्ञान लिए जाने से पहले प्रस्तावित आरोपियों को सभी दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य उपलब्ध कराए। साथ ही कहा गया कि आदेश का पालन न होने पर शिकायत खारिज कर दी जाएगी।

22 जनवरी 2026 को कथित अनुपालन न होने के आधार पर मजिस्ट्रेट ने शिकायत को खारिज कर दिया।

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मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी ने कहा कि BNSS की धारा 223(1) के प्रावधान का उद्देश्य आरोपियों को संज्ञान से पहले सुनवाई का अवसर देना है।

अदालत ने कहा, “आरोपी को सुनवाई का अवसर प्रदान करने की आवश्यकता का अर्थ यह नहीं है कि शिकायतकर्ता इस प्रारंभिक चरण में अपने समस्त साक्ष्य आरोपियों को उपलब्ध कराने के लिए बाध्य हो जाए।”

कोर्ट ने यह भी पाया कि शिकायतकर्ता द्वारा दायर धारा 94 BNSS का आवेदन, जिसमें महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मंगाने की मांग की गई थी, लंबित था। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने उस आवेदन पर विचार किए बिना शिकायत खारिज कर दी।

पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को यह देखना चाहिए था कि आंशिक अनुपालन पर्याप्त था या नहीं, अतिरिक्त समय दिया जा सकता था या नहीं, तथा लंबित आवेदन का पहले निपटारा किया जाना चाहिए था। केवल तकनीकी आधार पर शिकायत खारिज करना न्याय के हित में नहीं माना जा सकता।

हाई कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए 22 जनवरी 2026 का आदेश निरस्त कर दिया और निजी शिकायत को उसके मूल क्रमांक पर बहाल कर दिया।

अदालत ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह धारा 94 BNSS के आवेदन सहित सभी लंबित आवेदनों का विधि अनुसार निर्णय करे तथा सभी पक्षों को उचित अवसर प्रदान करते हुए आगे की कार्यवाही करे।

हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और सभी पक्ष ट्रायल कोर्ट के समक्ष अपने-अपने पक्ष रखने के लिए स्वतंत्र रहेंगे।

Case Details

Case Title: Vinay Prakash Singh @ Deepu Singh v. Pushpendra Singh @ Dimple Singh and Others

Case Number: MCRC No. 17776 of 2026

Judge: Justice Himanshu Joshi

Decision Date: 8 May 2026

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