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जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट: अलग रहने की सहमति होने पर पत्नी को मासिक भरण-पोषण नहीं, ₹2.5 लाख एकमुश्त राशि का आदेश

Vivek G.

सरिता देवी बनाम मोहन सिंह, जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से अलग रहने पर पत्नी को मासिक भरण-पोषण नहीं मिलेगा, लेकिन ₹2.5 लाख एकमुश्त भुगतान का आदेश दिया।

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जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट: अलग रहने की सहमति होने पर पत्नी को मासिक भरण-पोषण नहीं, ₹2.5 लाख एकमुश्त राशि का आदेश
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जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि पति-पत्नी आपसी सहमति से अलग रह रहे हों, तो पत्नी को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 488 के तहत मासिक भरण-पोषण का अधिकार नहीं मिलता। हालांकि अदालत ने परिस्थितियों को देखते हुए पति को पत्नी को ₹2.5 लाख की एकमुश्त राशि देने का निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति संजय परिहार की एकल पीठ ने यह आदेश सरिता देवी बनाम मोहन सिंह मामले में पारित किया।

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मामले की पृष्ठभूमि

रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों पक्षों का विवाह वर्ष 1990 में हुआ था और उनसे एक पुत्र पैदा हुआ। बाद में पत्नी ने आरोप लगाया कि पति ने दूसरी शादी कर ली है। इसके बाद उसने आपराधिक शिकायत और भरण-पोषण की याचिका दायर की।

साल 1995 में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया। पत्नी ने ₹10,000 को “फुल एंड फाइनल सेटलमेंट” के रूप में स्वीकार किया और अपनी शिकायत व भरण-पोषण याचिका वापस ले ली। इसके बाद दोनों अलग रहने लगे।

इसके बाद वर्ष 2003 में पत्नी ने केवल अपने नाबालिग बेटे के लिए भरण-पोषण की मांग की। लोक अदालत में समझौते के तहत पति ने बच्चे के लिए ₹300 प्रति माह देने पर सहमति जताई, जिसे बाद में बढ़ाकर ₹600 और फिर ₹1000 कर दिया गया।

अदालत के सामने यह भी रिकॉर्ड में आया कि इन कार्यवाहियों के दौरान पत्नी ने खुद को “तलाकशुदा” बताते हुए केवल बेटे के लिए भरण-पोषण मांगा था।

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बाद की कानूनी कार्यवाही

साल 2008 में पत्नी ने फिर से धारा 488 CrPC के तहत अपने लिए भरण-पोषण की नई याचिका दाखिल की।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, रामबन ने 2020 में आदेश देते हुए पति को ₹2,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया, जिसमें हर साल 10% की वृद्धि भी तय की गई।

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इस आदेश के खिलाफ पति ने सेशन कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की। सेशन जज ने 3 नवंबर 2020 को मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि दोनों पक्ष आपसी सहमति से अलग रह रहे थे, इसलिए पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार नहीं है।

अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए कहा कि यह साबित नहीं हुआ कि पक्षों के बीच कोई वैध “कस्टमरी डिवोर्स” था। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह कानून के तहत विवाह केवल विधिक प्रक्रिया से ही समाप्त हो सकता है।

पीठ ने कहा: “किसी प्रथा के आधार पर विवाह विच्छेद का दावा करने के लिए उस प्रथा को स्पष्ट रूप से साबित करना आवश्यक होता है, जो इस मामले में नहीं किया गया।”

हालांकि अदालत ने यह भी देखा कि पत्नी ने 1995 के समझौते के बाद लंबे समय तक अपने लिए भरण-पोषण की मांग नहीं की और कई कार्यवाहियों में खुद को तलाकशुदा बताया।

अदालत ने कहा: “रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि पक्षकार समझौते के बाद लंबे समय तक आपसी सहमति से अलग रह रहे थे। ऐसे में धारा 488(5) CrPC के तहत पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं होती।”

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अलग रहने की सहमति का प्रभाव

पीठ ने कहा कि भले ही समझौते से विवाह कानूनी रूप से समाप्त न हुआ हो, लेकिन इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों पक्ष अलग रहने के लिए सहमत थे।

अदालत के अनुसार: “जब पति-पत्नी स्वेच्छा से अलग रहने का निर्णय लेते हैं और उसी के आधार पर लंबे समय तक जीवन बिताते हैं, तो बाद में भरण-पोषण का दावा करना कानून की दृष्टि से स्वीकार्य नहीं होता।”

अदालत का अंतिम निर्णय

हाईकोर्ट ने सेशन कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए पत्नी की याचिका खारिज कर दी और कहा कि उसे मासिक भरण-पोषण नहीं मिलेगा।

हालांकि न्यायालय ने परिस्थितियों को देखते हुए पति को निर्देश दिया कि वह पत्नी को ₹2.5 लाख की एकमुश्त राशि छह महीने के भीतर अदा करे।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि निर्धारित समय में भुगतान नहीं किया गया, तो पत्नी इस राशि को 6% वार्षिक ब्याज के साथ वसूलने की हकदार होगी।

इसके साथ ही दोनों लंबित याचिकाओं का निस्तारण कर दिया गया।

Case Title: Sarita Devi v. Mohan Singh

Case No.: CRM(M) No. 444/2020 c/w CRM(M) No. 279/2021

Decision Date: 06 March 2026

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