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जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने दवा गुणवत्ता मामले में MD पर चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की, जांच में देरी पर कड़ी टिप्पणी

Vivek G.

सुधीर कुमार बनाम पीरज़ादा तसद्दुक हुसैन (ड्रग इंस्पेक्टर पुलवामा), जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने दवा गुणवत्ता मामले में Jacksons Laboratories के MD के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द की, जांच में देरी पर अहम फैसला।

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जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने दवा गुणवत्ता मामले में MD पर चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की, जांच में देरी पर कड़ी टिप्पणी
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जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने दवा की गुणवत्ता से जुड़े एक आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर के खिलाफ चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि जांच प्रक्रिया में हुई देरी के कारण आरोपी को कानून द्वारा दिए गए महत्वपूर्ण अधिकार से वंचित होना पड़ा। न्यायमूर्ति संजीव कुमार की एकल पीठ ने यह आदेश पारित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला वर्ष 2013 का है। ड्रग इंस्पेक्टर ने पुलवामा में एम/एस जे.एम. ट्रेडर्स, फार्मास्यूटिकल डिस्ट्रीब्यूटर्स के परिसर का निरीक्षण किया था। निरीक्षण के दौरान “Molcin Plus” नामक दवा का सैंपल लिया गया।

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सरकारी विश्लेषक (Government Analyst) ने अपनी रिपोर्ट में इस दवा को मानक गुणवत्ता का नहीं बताया। इसके बाद जांच के दौरान यह सामने आया कि दवा का निर्माण Jacksons Laboratories Pvt. Ltd. द्वारा किया गया था।

ड्रग इंस्पेक्टर ने रिपोर्ट की प्रति निर्माता कंपनी को भेजी और नोटिस जारी किया। कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर सुधीर कुमार ने जवाब देते हुए रिपोर्ट पर सवाल उठाया और कहा कि दवा निर्धारित मानकों पर खरी उतरती है।

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उन्होंने समयसीमा के भीतर लिखित रूप से यह सूचित कर दिया था कि वे सरकारी विश्लेषक की रिपोर्ट को चुनौती देना चाहते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि कानून के अनुसार उन्हें दवा के नमूने की केंद्रीय ड्रग्स प्रयोगशाला (Central Drugs Laboratory) से दोबारा जांच कराने का अधिकार है।

याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि:

“रिपोर्ट मिलने के बाद हमने स्पष्ट रूप से बताया था कि हम इस रिपोर्ट का खंडन करना चाहते हैं और नमूने की दोबारा जांच चाहते हैं।”

इसके बावजूद, ड्रग इंस्पेक्टर ने नमूने को केंद्रीय प्रयोगशाला में जांच के लिए भेजने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

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हाईकोर्ट के सामने दो महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न थे:

1. क्या ड्रग इंस्पेक्टर पर यह अनिवार्य है कि आरोपी के आपत्ति जताने पर दवा के नमूने को केंद्रीय प्रयोगशाला में दोबारा जांच के लिए भेजा जाए?

2. क्या किसी कंपनी के खिलाफ अपराध के मामले में केवल मैनेजिंग डायरेक्टर के खिलाफ शिकायत दायर की जा सकती है, जबकि कंपनी को आरोपी न बनाया गया हो?

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अदालत ने Drugs and Cosmetics Act, 1940 की धारा 23 और 25 का विस्तार से विश्लेषण किया।

पीठ ने कहा कि जब दवा का नमूना लिया जाता है तो उसे अलग-अलग हिस्सों में बांटा जाता है। इसका उद्देश्य यह होता है कि निर्माता या संबंधित व्यक्ति अपने हिस्से के नमूने की स्वतंत्र जांच करा सके।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति सरकारी विश्लेषक की रिपोर्ट को चुनौती देना चाहता है तो वह अदालत से नमूने को केंद्रीय प्रयोगशाला में दोबारा जांच के लिए भेजने का अनुरोध कर सकता है।

पीठ ने कहा:

“सिर्फ यह सूचना देना कि आरोपी रिपोर्ट का खंडन करना चाहता है, अपने आप में यह बाध्यता पैदा नहीं करता कि ड्रग इंस्पेक्टर नमूने को केंद्रीय प्रयोगशाला भेजे।”

अदालत ने यह भी पाया कि मामले में जांच और अभियोजन शुरू करने में पर्याप्त तेजी नहीं दिखाई गई।

जब तक याचिकाकर्ता अदालत में पेश हुए, तब तक दवा की शेल्फ लाइफ मार्च 2016 में समाप्त हो चुकी थी।

अदालत ने कहा कि इस देरी के कारण याचिकाकर्ता को नमूने की दोबारा जांच कराने का अवसर नहीं मिला, जो कि कानून द्वारा दिया गया एक महत्वपूर्ण अधिकार है।

पीठ ने कहा कि यदि समय रहते कार्रवाई की जाती, तो आरोपी अदालत से नमूने को केंद्रीय प्रयोगशाला भेजने का अनुरोध कर सकते थे।

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इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने माना कि अभियोजन की कार्यवाही जारी रखना न्यायसंगत नहीं होगा।

पीठ ने आदेश दिया:

“याचिका स्वीकार की जाती है और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, पुलवामा की अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही तथा 16 नवंबर 2015 का संज्ञान आदेश रद्द किया जाता है।”

इस प्रकार हाईकोर्ट ने मैनेजिंग डायरेक्टर के खिलाफ चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया।

Case Title: Sudhir Kumar vs Peerzada Tasaduq Hussain (Drug Inspector Pulwama)

Case No.: CRMC No. 453/2018

Decision Date: 09 March 2026

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