केरल हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी से जुड़े संवैधानिक अधिकारों पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी आरोपी को गिरफ्तारी की प्रक्रिया में संवैधानिक उल्लंघन के कारण रिहा किया गया है, तो पुलिस उसे उसी मामले में दोबारा गिरफ्तार करने से पहले अदालत की अनुमति लेना अनिवार्य होगा। अदालत ने कहा कि केवल पहली गिरफ्तारी में हुई प्रक्रिया संबंधी कमी को बाद में सुधार लेने से पुलिस को स्वतः दोबारा गिरफ्तारी का अधिकार नहीं मिल जाता।
यह फैसला न्यायमूर्ति डॉ. कौसर एडप्पागाथ ने कई संबद्ध जमानत याचिकाओं पर एक साथ सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
सभी याचिकाकर्ता एनडीपीएस अधिनियम के तहत दर्ज अलग-अलग मामलों में आरोपी थे। उन्हें पहले इसलिए रिहा किया गया था क्योंकि जांच एजेंसियां संविधान के अनुच्छेद 22(1) या अनुच्छेद 22(2) का पालन नहीं कर सकी थीं। कुछ मामलों में आरोपियों को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में नहीं बताए गए, जबकि एक मामले में उन्हें 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया।
याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि जेल से रिहा होते ही, कई मामलों में जेल परिसर के अंदर या बाहर, पुलिस ने उन्हें उसी अपराध में फिर से गिरफ्तार कर लिया और दोबारा न्यायिक हिरासत में भेज दिया। उनका कहना था कि यह कार्रवाई कानून और संविधान दोनों के विपरीत है।
हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी आरोपी को हमेशा के लिए दोबारा गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान करता हो। यदि जांच एजेंसी के पास कानूनन गिरफ्तारी के पर्याप्त आधार मौजूद हैं, तो वह दोबारा गिरफ्तारी कर सकती है।
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यह शक्ति पूरी तरह निरंकुश नहीं है और इसका प्रयोग न्यायिक निगरानी के बिना नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा,
"अनुच्छेद 22(1) और 22(2) में दिए गए संवैधानिक संरक्षण या BNSS/दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधान किसी व्यक्ति को दोबारा गिरफ्तार करने की शक्ति पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाते।"
पीठ ने कहा कि यदि पुलिस को बिना किसी न्यायिक नियंत्रण के दोबारा गिरफ्तारी की छूट दे दी जाए तो संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए सुरक्षा उपाय अर्थहीन हो जाएंगे। वहीं केवल प्रक्रिया संबंधी त्रुटि के कारण आरोपी को स्थायी रूप से गिरफ्तारी से मुक्त मान लेना भी कानून का उद्देश्य नहीं हो सकता।
अदालत ने आगे कहा,
"किसी भी बाद की गिरफ्तारी से पहले अदालत की अनुमति आवश्यक होगी, ताकि यह जांचा जा सके कि गिरफ्तारी और हिरासत वास्तव में आवश्यक है या नहीं।"
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी आरोपी को अनुच्छेद 22(1) या 22(2) के उल्लंघन के कारण जमानत पर रिहा किया गया है, तो पुलिस उसे दोबारा गिरफ्तार करने से पहले उस जमानत को रद्द कराने के लिए अदालत का रुख करेगी।
यदि आरोपी को बिना जमानत दिए केवल अवैध गिरफ्तारी के कारण रिहा किया गया है, तब भी जांच एजेंसी को दोबारा गिरफ्तारी, रिमांड या हिरासत के लिए संबंधित मजिस्ट्रेट या अदालत से पूर्व अनुमति लेनी होगी।
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी अनुमति का अनुरोध मिलने पर अदालत आरोपी को सुनवाई का अवसर देकर यथाशीघ्र, और संभव हो तो एक सप्ताह के भीतर, निर्णय करेगी।
रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि सभी याचिकाकर्ताओं को पहले संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन के कारण रिहा किया गया था, लेकिन पुलिस ने उसी मामले में उन्हें दोबारा गिरफ्तार करने से पहले संबंधित अदालत से कोई अनुमति नहीं ली।
अदालत ने यह भी नोट किया कि जिन मामलों में गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में नहीं बताए गए थे, वहां यह भी रिकॉर्ड पर नहीं था कि दोबारा गिरफ्तारी से पहले इस कमी को विधिवत दूर किया गया हो।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि दूसरी गिरफ्तारी कानून के अनुरूप नहीं थी और उसे वैध नहीं ठहराया जा सकता।
हाईकोर्ट ने सभी जमानत याचिकाएं स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को निर्धारित शर्तों के साथ जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया।
अदालत ने आदेश दिया कि प्रत्येक आरोपी एक-एक लाख रुपये के निजी मुचलके और दो जमानतदार प्रस्तुत करेगा। साथ ही उन्हें जांच में सहयोग करना होगा, प्रत्येक शनिवार जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होना होगा, गवाहों या साक्ष्यों को प्रभावित करने का प्रयास नहीं करना होगा तथा ट्रायल कोर्ट की अनुमति के बिना केरल राज्य नहीं छोड़ना होगा।
Case Details
Case Title: Ramjith Nayak v. State of Kerala and connected bail applications
Case Number: Bail Application No. 13215 of 2025 & connected cases
Judge: Justice Dr. Kauser Edappagath
Decision Date: 2 July 2026
















