Logo

पावर ऑफ अटॉर्नी धारक द्वारा दायर शिकायत में तकनीकी कमी से पूरी कार्यवाही रद्द नहीं हो सकती: केरल हाईकोर्ट

Shivam Y.

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि पावर ऑफ अटॉर्नी धारक द्वारा दायर शिकायत में तकनीकी कमी होने मात्र से चेक बाउंस मामले की दोषसिद्धि रद्द नहीं की जा सकती। - कन्नन बनाम मेसर्स आदिसिवा एंटरप्राइजेज और केरल राज्य

Advertisement
पावर ऑफ अटॉर्नी धारक द्वारा दायर शिकायत में तकनीकी कमी से पूरी कार्यवाही रद्द नहीं हो सकती: केरल हाईकोर्ट
Join Telegram

केरल उच्च न्यायालय ने चेक बाउंस मामले में एक आरोपी की सजा और दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए कहा है कि शिकायत में मौजूद तकनीकी त्रुटि, जब मुकदमा पूरी तरह चल चुका हो और शिकायतकर्ता स्वयं गवाही दे चुका हो, तब पूरी आपराधिक कार्यवाही को अमान्य नहीं बना सकती।

न्यायमूर्ति जी गिरीश ने यह फैसला आरोपी कन्नन द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनाया। आरोपी ने अपने खिलाफ धारा 138, परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) के तहत हुई दोषसिद्धि को चुनौती दी थी।

Advertisement

मामले की पृष्ठभूमि

मामला दो चेकों के अनादर (dishonour) से जुड़ा था। ये चेक 24 फरवरी 2014 के थे, जिनकी राशि क्रमशः ₹19.75 लाख और ₹10 लाख थी। शिकायतकर्ता फर्म M/s Adisiva Enterprises ने आरोप लगाया था कि आरोपी द्वारा जारी किए गए चेक बैंक से अनादृत होकर लौट आए।

कोल्लम की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए छह महीने की साधारण कैद और ₹29.50 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया था। बाद में अपीलीय अदालत ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।

इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से कहा गया कि मूल शिकायत ही कानूनन दोषपूर्ण थी क्योंकि इसे शिकायतकर्ता के पावर ऑफ अटॉर्नी धारक द्वारा दायर किया गया था, लेकिन शिकायत में यह नहीं बताया गया था कि उसे लेनदेन की प्रत्यक्ष व्यक्तिगत जानकारी थी।

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में मजिस्ट्रेट को मामले का संज्ञान ही नहीं लेना चाहिए था।

अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

अदालत ने कहा कि ट्रायल के दौरान स्वयं मूल शिकायतकर्ता अदालत में पेश हुआ और उसने पूरे लेनदेन के संबंध में गवाही दी। आरोपी को उसे जिरह (cross-examination) करने का पूरा अवसर भी मिला।

न्यायालय ने यह भी कहा कि जिन सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया गया, उनमें शुरुआती चरण में ही शिकायत की वैधता को चुनौती दी गई थी, जबकि वर्तमान मामले में आरोपी ने ट्रायल शुरू होने से पहले ऐसा कोई आपत्ति नहीं उठाई।

Advertisement

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 465 का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि केवल प्रक्रियात्मक त्रुटि के आधार पर दोषसिद्धि को रद्द नहीं किया जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि उससे “न्याय की विफलता” हुई है।

अदालत ने कहा,

“ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत के फैसलों को पलटने का कोई आधार नहीं बनता,” क्योंकि आरोपी को मुकदमे में अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिला था।

अदालत का फैसला

हाईकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा में आंशिक राहत दी।

अदालत ने छह महीने की साधारण कैद को घटाकर “अदालत उठने तक की कैद” में बदल दिया। हालांकि, ₹29.50 लाख मुआवजा देने और भुगतान न करने पर तय डिफॉल्ट सजा के आदेश को यथावत रखा गया।

Case Details

Case Title: Kannan v. M/s Adisiva Enterprises & State of Kerala

Case Number: Crl.R.P No.1038 of 2018

Judge: Justice G. Girish

Decision Date: May 18, 2026

Download Order
Advertisement

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Get it on Google PlayDownload on the App Store
CourtBook Mobile App

Recommended Posts