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सिर्फ़ सामाजिक रीति-रिवाजों के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि दुल्हन ने पति या ससुराल वालों को सोना सौंपा; सबूत ज़रूरी हैं: केरल हाई कोर्ट

Shivam Y.

केरल हाई कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक अदालतें बिना सबूत के यह नहीं मान सकतीं कि पत्नी का सोना उन्हें सौंपा गया था। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश में बदलाव किया और शादी के सिलसिले में मिले ₹5 लाख को वापस करने के फैसले को बरकरार रखा। - विनू के.एस. और अन्य बनाम वीना विश्वन

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सिर्फ़ सामाजिक रीति-रिवाजों के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि दुल्हन ने पति या ससुराल वालों को सोना सौंपा; सबूत ज़रूरी हैं: केरल हाई कोर्ट
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केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि वैवाहिक मामलों में अदालतें केवल सामान्य सामाजिक धारणाओं के आधार पर यह मानकर नहीं चल सकतीं कि पत्नी ने शादी के बाद अपने सोने के आभूषण पति या उसके परिवार को सुरक्षित रखने के लिए सौंप दिए थे। ऐसे निष्कर्ष केवल ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही निकाले जा सकते हैं।

डिवीजन बेंच ने फैमिली कोर्ट के आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए पत्नी को ₹5 लाख लौटाने का निर्देश बरकरार रखा, लेकिन सोने की मात्रा और विवाह खर्च से जुड़े आदेश में बदलाव किया।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला विनु के.एस., उनके पिता ससिंद्रन और उनकी पत्नी वीना विश्वन के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा है।

जून 2019 में विवाह के बाद पत्नी ने फैमिली कोर्ट, मुवट्टुपुझा में याचिका दाखिल कर दावा किया कि सगाई के समय ₹5 लाख दिए गए थे और विवाह के दौरान मिले सोने के आभूषण पति तथा उसके परिवार के पास चले गए, जिन्हें वापस नहीं किया गया। उन्होंने सोना, नकद राशि, विवाह में हुए खर्च और मुआवजे की मांग की।

फैमिली कोर्ट ने पति और उसके पिता को ₹5 लाख ब्याज सहित लौटाने, 80 सॉवरेन सोना या उसकी बाजार कीमत देने तथा ₹6,89,350 विवाह खर्च के रूप में अदा करने का आदेश दिया था। मुआवजे और भरण-पोषण की मांग खारिज कर दी गई थी। इसी आदेश को पति और उसके पिता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

जस्टिस ए.के. जयशंकरन नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के. की खंडपीठ ने कहा कि वैवाहिक मामलों में तथ्यों का परीक्षण "संभावनाओं के संतुलन (Preponderance of Probabilities)" के आधार पर किया जाता है, न कि आपराधिक मामलों की तरह संदेह से परे प्रमाण के आधार पर।

पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी पत्नी के सोने या धन के पति अथवा उसके रिश्तेदारों को सौंपे जाने का निष्कर्ष तभी निकाला जा सकता है जब रिकॉर्ड पर ऐसे तथ्य मौजूद हों जो इस निष्कर्ष का समर्थन करते हों।

अदालत ने कहा, "अदालत केवल अपने अनुमान या कल्पना के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकती कि वास्तव में क्या हुआ होगा।"

पीठ ने यह भी कहा कि पुराने सामाजिक व्यवहारों को आज के समय में स्वतः लागू नहीं माना जा सकता। आज कई शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिलाएं विवाह के बाद भी अपने आभूषण और संपत्ति पर स्वयं नियंत्रण बनाए रखती हैं। इसलिए अदालतों को प्रत्येक मामले में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निर्णय देना चाहिए।

रिकॉर्ड पर मौजूद मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि पत्नी, उसके पिता और एक अन्य गवाह की गवाही से यह साबित होता है कि सगाई के समय ₹5 लाख दिए गए थे।

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इसलिए फैमिली कोर्ट द्वारा ₹5 लाख को 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाने का आदेश सही पाया गया और उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं किया गया।

हालांकि, सोने के संबंध में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के निष्कर्ष से पूरी तरह सहमति नहीं जताई।

अदालत ने माना कि रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि विवाह के समय पत्नी के पास 80 सॉवरेन सोना था, लेकिन ऐसा कोई पर्याप्त साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि पूरा सोना पति या उसके परिवार को सौंप दिया गया था।

रिकॉर्ड में केवल 242.9 ग्राम सोने के संबंध में विश्वसनीय साक्ष्य मिले, जिसे विवाह के कुछ ही समय बाद गिरवी रखा गया था। इसलिए अदालत ने माना कि केवल इसी मात्रा के संबंध में सौंपे जाने और उसके उपयोग का पर्याप्त आधार मौजूद है।

इसी कारण हाईकोर्ट ने पत्नी के अधिकार को 242.9 ग्राम (लगभग 30 सॉवरेन) सोना या उसकी भुगतान की तिथि पर बाजार कीमत तक सीमित कर दिया।

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए ₹6,89,350 विवाह खर्च लौटाने के आदेश को भी निरस्त कर दिया।

पीठ ने कहा कि विवाह का खर्च सामान्यतः दोनों परिवार अपनी-अपनी इच्छा और क्षमता के अनुसार करते हैं। जब विवाह वैध था और उसे शून्य घोषित नहीं किया गया, तब केवल विवाह समाप्त होने के आधार पर एक पक्ष को दूसरे पक्ष का विवाह खर्च लौटाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

अदालत ने माना कि इस मामले में पति और उसके परिवार पर विवाह खर्च की पूरी जिम्मेदारी डालना कानूनी रूप से उचित नहीं था।

केरल हाईकोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश में संशोधन किया। अदालत ने निर्देश दिया कि अपीलकर्ता पत्नी को ₹5 लाख मूल याचिका दायर होने की तारीख से 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाएं। साथ ही 30 सॉवरेन (242.9 ग्राम) सोना या उसके भुगतान की तिथि पर उसकी बाजार कीमत भी अदा करें।

विवाह खर्च लौटाने का आदेश रद्द कर दिया गया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित भुगतान नहीं किया जाता है तो पत्नी कानून के अनुसार अपीलकर्ताओं या उनकी संपत्तियों से राशि और सोने का मूल्य वसूलने की हकदार होगी।

Case Details

Case Title: Vinu K.S. & Another v. Veena Viswan

Case Number: Mat. Appeal No. 1095 of 2024

Judges: Justice A.K. Jayasankaran Nambiar and Justice Preeta A.K.

Decision Date: 13 July 2026

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