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केरल हाई कोर्ट ने मदरसा टीचर की सज़ा को बरकरार रखा, 20 साल की POCSO सज़ा के ख़िलाफ़ अपील खारिज की।

Shivam Y.

केरल हाई कोर्ट ने POCSO एक्ट के तहत एक मदरसा टीचर की सज़ा और 20 साल की कैद को बरकरार रखा। कोर्ट ने बच्चे की गवाही को भरोसेमंद माना और झूठे आरोप में फंसाने के दावों को खारिज कर दिया। - रशीद बनाम केरल राज्य

केरल हाई कोर्ट ने मदरसा टीचर की सज़ा को बरकरार रखा, 20 साल की POCSO सज़ा के ख़िलाफ़ अपील खारिज की।
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केरल हाईकोर्ट ने 12 जून 2026 को एक बेहद संवेदनशील मामले में अपना फैसला सुनाया। थ्रिसूर जिले के मुल्लासेरी इलाके के एक मदरसे में उस्ताद यानी धार्मिक शिक्षक के रूप में काम करने वाले रशीद की अपील को जस्टिस ए. बधरुद्दीन ने खारिज कर दिया। रशीद ने कुन्नमकुलम के फास्ट ट्रैक स्पेशल POCSO कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे एक नौ साल के बच्चे के यौन उत्पीड़न का दोषी पाया गया था।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई दखल देने से इनकार कर दिया और 20 साल की कठोर कैद की सज़ा को बरकरार रखा।

मामले की पृष्ठभूमि

साल 2020 का अगस्त महीना। पूरे देश में कोरोना महामारी का कहर था। स्कूल-मदरसे बंद थे और पढ़ाई ऑनलाइन हो रही थी। थ्रिसूर के मुल्लासेरी में नूरुल हिदाया मदरसे में भी उस वक्त ऑनलाइन परीक्षाएं चल रही थीं।

पीड़ित बच्चा जिसे अदालती कागजों में PW1 कहा गया है उस वक्त महज नौ साल का था। वह वानिविलासम स्कूल, पादूर में कक्षा पाँचवीं का छात्र था और साथ ही नूरुल हिदाया मदरसे में भी पढ़ता था। रशीद इसी मदरसे का उस्ताद था और मदरसे से लगे सिद्धीकेल अकबर जुमा मस्जिद के परिसर में रहता था।

25 अगस्त 2020 को दोपहर करीब चार बजे, बच्चा परीक्षा से जुड़ी शंकाएं दूर करने के लिए रशीद के कमरे में गया। वहाँ रशीद ने बच्चे के साथ यौन उत्पीड़न किया।

बच्चा डरा हुआ था। उसने तुरंत किसी को कुछ नहीं बताया। शाम को मगरिब की नमाज़ के बाद उसने अपनी माँ को सब कुछ बताया। माँ ने पति को फोन किया और अगले दिन परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। 26 अगस्त 2020 को रशीद को गिरफ्तार कर लिया गया।

कुन्नमकुलम के फास्ट ट्रैक स्पेशल POCSO कोर्ट ने मामले की विस्तार से सुनवाई की। अभियोजन पक्ष की ओर से 20 गवाह पेश किए गए और 27 दस्तावेज़ी सबूत दाखिल किए गए। बच्चे की गवाही, उसकी माँ की गवाही, मदरसे के सचिव की गवाही और डॉक्टर की रिपोर्ट सब मिलाकर अदालत ने रशीद को दोषी पाया।

ट्रायल कोर्ट ने रशीद को इन धाराओं में दोषी ठहराया:

IPC की धारा 377 - अप्राकृतिक अपराध (10 साल की कैद)

POCSO एक्ट की धारा 5(f) और 5(m) सहपठित धारा 6(1) - गंभीर प्रवेशन यौन हमला (20 साल की कैद, प्रत्येक के लिए)

POCSO एक्ट की धारा 9(m) और 9(o) सहपठित धारा 10 - (7-7 साल की कैद)

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 75 - (3 साल की कैद)

सभी सज़ाएं एक साथ चलने का आदेश दिया गया। इसके अलावा जुर्माने की राशि में से 40,000 रुपये पीड़ित बच्चे को मुआवज़े के रूप में देने का निर्देश भी दिया गया।

रशीद के वकीलों ने हाईकोर्ट के सामने कई दलीलें रखीं।

सबसे पहला तर्क यह था कि पूरा मामला झूठा है। वकीलों ने कहा कि रशीद सुन्नी मुस्लिम समुदाय से है और उसे मुस्लिम समुदाय के ही एक दूसरे वर्ग ने सांप्रदायिक द्वेष के चलते फँसाया है।

दूसरा तर्क यह था कि बच्चे की गवाही (PW1) न तो विश्वसनीय है, न ही पर्याप्त। वकीलों ने कहा कि बच्चे की गवाही में कई विरोधाभास हैं और अकेले उसके बयान के आधार पर सज़ा नहीं दी जा सकती।

बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के दो अहम फैसलों का भी हवाला दिया पंच्छी बनाम स्टेट ऑफ UP (AIR 1998 SC 2726) और राय संदीप उर्फ दीपू बनाम स्टेट ऑफ NCT दिल्ली (2012(8) SCC 21) जिनमें कहा गया है कि बाल गवाह की गवाही को अत्यंत सावधानी से परखा जाना चाहिए।

जस्टिस बधरुद्दीन ने पूरे साक्ष्य की बारीकी से समीक्षा की।

कोर्ट ने पाया कि PW1 यानी पीड़ित बच्चे की गवाही में कोई ऐसा विरोधाभास नहीं मिला जो उसे अविश्वसनीय बनाए। बच्चे की माँ PW2, मदरसे के सचिव PW3, डॉक्टर और अन्य गवाहों की गवाहियाँ सब मिलकर एक ही दिशा में इशारा करती थीं।

कोर्ट ने साफ कहा - "PW1 की गवाही पूरी तरह विश्वसनीय पाई गई, जिसे अन्य साक्ष्यों का भी समर्थन मिला।"

सांप्रदायिक द्वेष वाले तर्क पर कोर्ट ने कहा कि इस बात का कोई ठोस सबूत नहीं है कि किसी धार्मिक गुटबाजी की वजह से यह मामला दर्ज करवाया गया। यह दलील बेबुनियाद पाई गई।

PW1 के "sterling witness" न होने की दलील को भी कोर्ट ने "अस्वीकार्य" बताते हुए खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट ने रशीद की सज़ा में कोई बदलाव नहीं किया।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि POCSO एक्ट की धारा 5(f) और 5(m) के तहत धारा 6(1) के अंतर्गत न्यूनतम सज़ा 20 साल की कठोर कैद है, जो आजीवन कारावास तक बढ़ सकती है। ट्रायल कोर्ट ने पहले ही न्यूनतम सज़ा दी थी, इसलिए उसमें कोई कटौती संभव नहीं थी।

अपील खारिज कर दी गई। हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि इस फैसले की प्रति संबंधित निचली अदालत को अनुपालन के लिए भेजी जाए।

Case Details:

Case Title: Rasheed v. State of Kerala

Case No.: CRL.A 421 of 2023

Judge: Justice A. Badharudeen

Decision Date: June 12, 2026

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