Logo

समान भूमिका वाले सह-आरोपी को मिली थी जमानत, फिर दूसरे की क्यों हुई खारिज? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेशन जज से मांगा जवाब

CB News Desk
Add Court Book as a preferred source on Google

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक आरोपी को ज़मानत दे दी और गाज़ियाबाद के सेशंस जज को यह बताने का निर्देश दिया कि ज़मानत की कार्यवाही में उसी तरह की स्थिति वाले एक सह-आरोपी के साथ अलग व्यवहार क्यों किया गया। - मोहम्मद रफ़ीक उर्फ़ रफ़ीकुल इस्लाम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य।

समान भूमिका वाले सह-आरोपी को मिली थी जमानत, फिर दूसरे की क्यों हुई खारिज? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेशन जज से मांगा जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में न केवल एक आरोपी को जमानत दी, बल्कि गाजियाबाद के एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ADJ) से यह भी पूछा कि समान भूमिका वाले दो आरोपियों के मामलों में अलग-अलग जमानत आदेश क्यों पारित किए गए।

न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने कहा कि न्यायिक निर्णयों में एकरूपता और समान कानूनी सिद्धांतों का पालन न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है। इसी आधार पर अदालत ने संबंधित एडीजे से सात दिन के भीतर विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा है।

मामले की पृष्ठभूमि

मोहम्मद रफीक उर्फ रफीकुल इस्लाम ने केस क्राइम नंबर 197/2026 में जमानत की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। यह मामला गाजियाबाद के साहिबाबाद थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज किया गया है।

बचाव पक्ष का कहना था कि आवेदक पर घायल नौशाद को चाकू मारने का आरोप है, लेकिन मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार उसके शरीर पर केवल एक चाकू का घाव पाया गया और अधिकांश चोटें साधारण प्रकृति की थीं। आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास भी नहीं है और वह 27 अप्रैल 2026 से जेल में बंद है।

Court Book subscription: bare acts, legal drafts, court judgments and ad-free legal news, plans from ₹30/month

बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि सह-आरोपी अंशु, जिस पर दूसरे घायल दीपक को चाकू मारने का आरोप है, उसे पहले ही ट्रायल कोर्ट से जमानत मिल चुकी है। ऐसे में आवेदक का मामला भी समान आधार पर विचार योग्य है।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

रिकॉर्ड, मेडिकल साक्ष्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि आवेदक जमानत का हकदार है।

पीठ ने कहा, “मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त किए बिना यह न्यायालय मानता है कि आवेदक ने जमानत दिए जाने का प्रथमदृष्टया आधार स्थापित किया है।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, उसके हिस्से केवल एक चाकू का वार बताया गया है और घायल को आई चोटें जानलेवा या गंभीर प्रकृति की नहीं पाई गईं। साथ ही, समान भूमिका वाले सह-आरोपी अंशु को पहले ही जमानत मिल चुकी है।

हालांकि, रिकॉर्ड की जांच के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि 14 मई 2026 को आवेदक की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी, जबकि लगभग समान भूमिका वाले सह-आरोपी अंशु को 9 जून 2026 को जमानत दे दी गई।

इस पर अदालत ने कहा, “न्यायिक निर्णयों में एकरूपता और कानूनी सिद्धांतों का समान रूप से लागू होना संस्थागत महत्व का विषय है। इसलिए संबंधित न्यायालय से इस अंतर के संबंध में स्पष्टीकरण लिया जाना उचित है।”

हाईकोर्ट ने गाजियाबाद के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, कोर्ट नंबर-7 को निर्देश दिया कि वे सात दिनों के भीतर यह स्पष्ट करें कि ऐसे कौन-से तथ्य, परिस्थितियाँ या कानूनी आधार थे जिनके कारण मोहम्मद रफीक की जमानत खारिज की गई, जबकि समान भूमिका वाले सह-आरोपी अंशु को जमानत दे दी गई।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह स्पष्टीकरण केवल प्रशासनिक उद्देश्य से मांगा गया है और इसे पूर्व में पारित न्यायिक आदेशों की वैधता या मेरिट पर टिप्पणी नहीं माना जाएगा।

निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मोहम्मद रफीक उर्फ रफीकुल इस्लाम की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें निर्धारित शर्तों के साथ जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। साथ ही, न्यायालय ने समान परिस्थितियों वाले आरोपियों के मामलों में अलग-अलग जमानत आदेश पारित किए जाने के कारणों पर संबंधित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश से विस्तृत स्पष्टीकरण तलब किया।

Case Details

Case Title: Mohammad Rafiq @ Rafiqul Islam v. State of U.P.

Case Number: Criminal Misc. Bail Application No. 19253 of 2026

Judge: Justice Vivek Kumar Singh

Decision Date: June 17, 2026

PDF
Download Order
Free access
Open PDF

Take CourtBook Everywhere

Access your account on the go with our mobile app.

Get it on Google PlayDownload on the App Store
Join the Court Book WhatsApp channel for latest judgments, notifications, legal news and exam updates