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सुप्रीम कोर्ट ने कहा- बीमा कंपनी से दावा करने के लिए फाइनेंसर का सीधा अनुबंध होना जरूरी

CB News Desk
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सुप्रीम कोर्ट ने एक फाइनेंसर की अपील खारिज करते हुए कहा कि बीमा अनुबंध केवल बीमाधारक और बीमा कंपनी के बीच होता है, इसलिए तीसरा पक्ष सीधे दावा नहीं कर सकता। - के. प्रकाशचंद बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- बीमा कंपनी से दावा करने के लिए फाइनेंसर का सीधा अनुबंध होना जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उस फाइनेंसर की अपील खारिज कर दी है जिसने चोरी हुई एक वाहन के संबंध में बीमा कंपनी से मुआवजे की मांग की थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि बीमा अनुबंध बीमाधारक और बीमा कंपनी के बीच का व्यक्तिगत अनुबंध होता है और किसी तीसरे पक्ष को केवल उसी आधार पर दावा करने का अधिकार नहीं मिल जाता कि उसका वाहन में वित्तीय हित था।

मामले की पृष्ठभूमि

मामले के अनुसार, अपीलकर्ता के. प्रकाशचंद ने एक व्यक्ति को वाहन खरीदने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की थी। वाहन का व्यापक बीमा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से कराया गया था।

फाइनेंसर का कहना था कि ऋण लेने वाला व्यक्ति समय पर किस्तें नहीं चुका पा रहा था, जिसके चलते उसने दिसंबर 2003 में वाहन उसके हवाले कर दिया। इसके बाद वाहन कथित रूप से चोरी हो गया। पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई, लेकिन वाहन बरामद नहीं हो सका।

इसके बाद फाइनेंसर ने बीमा कंपनी से दावा प्रस्तुत किया। हालांकि, बीमा कंपनी ने दावा अस्वीकार कर दिया। इसके खिलाफ उपभोक्ता मंच में शिकायत दायर की गई, जहां जिला उपभोक्ता आयोग और बाद में राज्य आयोग ने फाइनेंसर के पक्ष में फैसला दिया। लेकिन राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने इन आदेशों को पलट दिया, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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सुनवाई के दौरान फाइनेंसर की ओर से दलील दी गई कि वाहन पर उसका वित्तीय हित था और बीमा पॉलिसी में हाइपोथिकेशन का उल्लेख भी मौजूद था। इसलिए उसे बीमा राशि प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए।

वहीं बीमा कंपनी ने कहा कि वह केवल बीमाधारक के साथ हुए अनुबंध से बंधी है और फाइनेंसर न तो वाहन का पंजीकृत मालिक था और न ही बीमा अनुबंध का पक्षकार।

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय आयोग की राय से सहमति जताते हुए कहा कि फाइनेंसर और बीमा कंपनी के बीच किसी प्रकार का प्रत्यक्ष संविदात्मक संबंध (Privity of Contract) नहीं था।

पीठ ने कहा, “राष्ट्रीय आयोग ने सही माना कि अपीलकर्ता और बीमा कंपनी के बीच कोई प्रत्यक्ष अनुबंध नहीं था।”

अदालत ने यह भी नोट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई स्पष्ट दस्तावेज नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि वाहन वास्तव में फाइनेंसर को सौंपा गया था। इसके अलावा, कथित चोरी की घटना के संबंध में भी पर्याप्त विवरण प्रस्तुत नहीं किए गए।

पीठ ने कहा कि बीमा अनुबंध मूल रूप से बीमाधारक और बीमा कंपनी के बीच का निजी अनुबंध होता है और सामान्यतः कोई तीसरा व्यक्ति उस अनुबंध के आधार पर दावा नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बीमा कंपनी उस समझौते का हिस्सा नहीं थी जो फाइनेंसर और ऋण लेने वाले व्यक्ति के बीच हुआ था। इसलिए बीमा कंपनी को फाइनेंसर के नुकसान की भरपाई करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा, “बीमा कंपनी को अपीलकर्ता को क्षतिपूर्ति देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।”

इन निष्कर्षों के आधार पर न्यायालय ने Civil Appeal No. 20846 of 2017 को खारिज कर दिया और लंबित सभी आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया।

Case Details:

Case Title: K. Prakashchand v. Oriental Insurance Co. Ltd.

Case Number: Civil Appeal No. 20846 of 2017

Bench: Justice Sandeep Mehta and Justice Vijay Bishnoi

Decision Date: June 18, 2026

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