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सर्वोच्च न्यायालय ने स्वामित्व को एक अलग कानूनी इकाई नहीं माना, पट्टा विवाद में एकमात्र स्वामी को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी माना

Vivek G.

डोगीपर्थी वेंकट सतीश एवं अन्य बनाम पिल्ला दुर्गा प्रसाद एवं अन्य - उच्चतम न्यायालय ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि स्वामित्व एक कानूनी इकाई नहीं है; पट्टा विवादों में स्वामी उत्तरदायी रहता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने स्वामित्व को एक अलग कानूनी इकाई नहीं माना, पट्टा विवाद में एकमात्र स्वामी को व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी माना

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय का निर्णय रद्द करते हुए स्पष्ट किया है कि एक प्रोप्राइटरशिप (एकल स्वामित्व व्यवसाय) कोई स्वतंत्र कानूनी इकाई नहीं है और वास्तविक पक्षकार हमेशा उसका स्वामी ही होता है।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद अप्रैल 2005 में हुए एक पट्टे के समझौते से शुरू हुआ था, जिसके तहत अपीलकर्ताओं ने अपनी संपत्ति ‘आदित्य मोटर्स’ नामक व्यवसाय को किराये पर दी थी। यह एकल स्वामित्व व्यवसाय था, जिसका मालिक पिल्ला दुर्गा प्रसाद था। पट्टा समाप्त होने के बाद भी परिसर खाली नहीं किया गया, जिसके चलते मालिकों ने किरायेदार और अन्य कब्जेदारों के खिलाफ निष्कासन कार्यवाही शुरू की।

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वाद के दौरान अपीलकर्ताओं ने प्रार्थनापत्र में संशोधन किया और आदित्य मोटर्स नाम हटाकर सीधे उसके स्वामी का नाम जोड़ दिया। बाद में प्रतिवादी ने यह तर्क दिया कि संशोधित प्रार्थनापत्र में उसके खिलाफ कोई कारण-कार्रवाई (Cause of Action) नहीं बनती।

उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट की राय

सन् 2018 में निचली अदालत ने सीपीसी की आदेश 7 नियम 11 के तहत दायर वाद खारिज करने की अर्जी को ठुकरा दिया था। लेकिन 2023 में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने इसे पलटते हुए कहा कि प्रोप्राइटरशिप को पक्षकार बनाया जाना चाहिए था।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने की, ने उच्च न्यायालय की इस दलील से असहमति जताई। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि प्रोप्राइटरशिप महज़ एक व्यापारिक नाम है, यह कोई ज्यूरिस्टिक पर्सन (कानूनी व्यक्तित्व) नहीं है।

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"एक बार जब स्वामी को प्रोप्राइटरशिप का प्रतिनिधि बनाकर पक्षकार बना दिया जाता है, तो किसी को कोई हानि नहीं होती," अदालत ने कहा।

न्यायालय ने यह भी माना कि उच्च न्यायालय ने "अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण" अपनाया, जबकि वास्तविक कारण-कार्रवाई हमेशा उस स्वामी के खिलाफ थी जिसने पट्टे पर हस्ताक्षर किए थे।

निर्णय में यह रेखांकित किया गया कि यद्यपि सीपीसी की आदेश 30 नियम 10 प्रोप्राइटरशिप को उसके व्यापारिक नाम से मुक़दमा झेलने की अनुमति देता है, परंतु वास्तविक पक्षकार हमेशा स्वामी ही होता है।

न्यायालय ने अशोक ट्रांसपोर्ट एजेंसी बनाम अवधेश कुमार (1998) तथा शंकर फाइनेंस एंड इन्वेस्टमेंट बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2008) के फैसलों का उल्लेख किया, जिनमें यह सिद्ध किया गया था कि भले ही व्यवसाय किसी अन्य नाम से चलता हो, कानूनी दायित्व से बच नहीं सकता और जिम्मेदारी सीधे मालिक की होगी।

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सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत का आदेश बहाल करते हुए निष्कासन वाद को मेरिट पर आगे बढ़ाने का निर्देश दिया। इस निर्णय से यह स्पष्ट हो गया कि कानूनी विवादों में एकल स्वामित्व व्यवसाय को स्वतंत्र इकाई नहीं माना जाएगा और मालिक स्वयं उत्तरदायी होगा।

अदालत ने दृढ़ शब्दों में कहा:

"प्रोप्राइटरशिप को कंपनी या साझेदारी फर्म के बराबर नहीं माना जा सकता। कारण-कार्रवाई सीधे उस स्वामी के खिलाफ बनी जिसने पट्टा समझौते पर हस्ताक्षर किए।"

केस का शीर्षक: डोगीपार्थी वेंकट सतीश एवं अन्य बनाम पिल्ला दुर्गा प्रसाद एवं अन्य

केस संख्या: सिविल अपील संख्या……, 2025 (विशेष अनुमति याचिका (C) संख्या 25938, 2023 से उत्पन्न)

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