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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट न्यायिक आदेशों के बावजूद दूसरी मातृत्व अवकाश को अस्वीकार करने पर राज्य विभाग की कड़ी आलोचना की

Shivam Y.

सुशीला पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य - इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आदेश के बावजूद मातृत्व अवकाश देने से इनकार करने पर उत्तर प्रदेश के अधिकारी को चेतावनी दी, कहा कि गर्भावस्था में दो वर्ष का अंतराल अनिवार्य नहीं है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट न्यायिक आदेशों के बावजूद दूसरी मातृत्व अवकाश को अस्वीकार करने पर राज्य विभाग की कड़ी आलोचना की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग की कड़ी आलोचना की है, जिसने एक कर्मचारी को प्रसूति अवकाश देने से इनकार कर दिया, जबकि अदालत ने पहले ही स्पष्ट निर्देश दिए थे। न्यायमूर्ति अजीत कुमार ने सुशीला पटेल की याचिका पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि विभाग ने न्यायिक आदेशों की पूरी तरह अनदेखी की है और उस पर अवमानना की कार्रवाई हो सकती है।

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मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता ने 2024 में दूसरी बार प्रसूति अवकाश के लिए आवेदन किया था, जिसे यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि पहली और दूसरी गर्भावस्था के बीच कम से कम दो साल का अंतर होना चाहिए। उन्होंने इस निर्णय को चुनौती दी और 6 नवंबर 2024 को हाईकोर्ट ने खारिज आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने अपने पहले के फैसले स्म्ट. गुड्डी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2022) का हवाला दिया था, जिसमें यह स्पष्ट कर दिया गया था कि दो साल का अंतर सेवा नियमों के अंतर्गत अनिवार्य नहीं है।

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इसके बावजूद जब पटेल ने दिसंबर 2024 में अदालत का आदेश संलग्न कर दोबारा आवेदन किया, तो उद्यान निदेशक ने उसी आधार पर उनका आवेदन फिर से अस्वीकार कर दिया। इस पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया।

न्यायाधीश ने टिप्पणी की,

"यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बार-बार दिए गए निर्देशों के बावजूद विभाग कानूनी स्थिति को समझने में विफल रहा और बिना किसी उचित कारण के प्रसूति अवकाश से वंचित किया।"

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अदालत ने आगे कहा कि यह आचरण स्पष्ट अवमानना है, क्योंकि यह न केवल नवंबर 2024 के आदेश की अनदेखी है बल्कि 2022 के पूर्ववर्ती निर्णय की भी अवहेलना है। न्यायमूर्ति अजीत कुमार ने उत्तर प्रदेश उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण निदेशक को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने और यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि उनके विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।

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यह मामला सरकारी सेवा में महिला कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण संरक्षण को उजागर करता है। अदालत ने पुनः स्पष्ट किया कि प्रसूति अवकाश एक मौलिक अधिकार है और इसे मनमाने नियमों जैसे दो साल के गर्भावस्था अंतराल से सीमित नहीं किया जा सकता। अवमानना कार्यवाही की चेतावनी देकर अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि सरकारी अधिकारी न्यायिक आदेशों का अक्षरशः पालन करें।

अब यह मामला 1 सितंबर 2025 को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है, जिसमें संबंधित अधिकारी को अपने कृत्य का औचित्य साबित करना होगा।

केस का शीर्षक: सुशीला पटेल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 3 अन्य

केस संख्या: WRIT - A No. 12191 of 2025

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