केरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मजिस्ट्रेट कमिटल स्टेज पर भी जमानत आवेदन पर विचार कर सकते हैं, और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 232 के दूसरे प्रावधान के बावजूद इस पर कोई रोक नहीं है।
यह फैसला जस्टिस वी.जी. अरुण ने Crl.M.C. No. 6925 of 2025 की सुनवाई करते हुए दिया। यह याचिका विष्णु ने दायर की थी, जो क्राइम नंबर 27/2024 में अकेला आरोपी है। यह मामला तिरुवनंतपुरम के कट्टाक्काडा एक्साइज रेंज ऑफिस ने दर्ज किया था।
केस की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता विष्णु (36) पर आबकारी अधिनियम की धारा 55(i) के तहत आरोप लगाया गया था। आरोप है कि उसने अपने किराए के घर से इंडियन मेड फॉरेन लिकर (IMFL) बेची और 8 मई 2024 को शाम 7:30 बजे एक्साइज अधिकारियों ने उसके पास से 1 लीटर शराब जब्त की।
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विष्णु के पहले जमानत (एंटीसिपेटरी बेल) के प्रयास सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने खारिज कर दिए थे। इसके बाद उसने हाईकोर्ट से गुहार लगाई कि उसे ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का मौका दिया जाए और उसी दिन उसकी जमानत अर्जी पर सुनवाई की जाए।
- याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि धारा 232 BNSS के दूसरे प्रावधान के कारण मजिस्ट्रेट जमानत आवेदन पर विचार करने से हिचक सकते हैं। साथ ही, पहले की एंटीसिपेटरी बेल याचिकाओं की अस्वीकृति मजिस्ट्रेट के निर्णय को प्रभावित नहीं करनी चाहिए। इसके लिए सुकुमारी बनाम राज्य केरल (2001 KHC 43) के फैसले का हवाला दिया गया।
- लोक अभियोजक (पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि विष्णु जांच के दौरान फरार रहा और कमिटल स्टेज पर भी पेश नहीं हुआ। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि धारा 232 का दूसरा प्रावधान मजिस्ट्रेट को जमानत याचिका सुनने से नहीं रोकता।
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जस्टिस वी.जी. अरुण ने BNSS की धारा 232 (जो पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 209 थी) की व्याख्या की। कोर्ट ने कहा:
“यदि दूसरे प्रावधान को इस तरह समझा जाए कि मजिस्ट्रेट जमानत पर विचार नहीं कर सकते, तो इससे आरोपी का सेशन कोर्ट में केस कमिट होने तक जमानत मांगने का अधिकार छिन जाएगा।”
कोर्ट ने कहा कि जमानत एक वैधानिक अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा है। गुडिकांटी नरसिम्हुलु बनाम पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (1978) 1 SCC 240 मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने जस्टिस कृष्ण अय्यर के शब्द उद्धृत किए:
“जमानत का मुद्दा स्वतंत्रता, न्याय, सार्वजनिक सुरक्षा और सरकारी खजाने पर बोझ से जुड़ा है। इन सबके चलते एक संवेदनशील जमानत न्यायशास्त्र सामाजिक दृष्टि से जरूरी है।”
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हाईकोर्ट ने सतेन्द्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई (2022) 10 SCC 51 मामले का भी हवाला दिया और कहा कि कमिटल स्टेज पर मजिस्ट्रेट के पास जमानत देने या आरोपी को हिरासत में भेजने का विवेकाधिकार है।
कोर्ट ने माना कि धारा 232 का दूसरा प्रावधान मजिस्ट्रेट को जमानत याचिका पर विचार करने से नहीं रोकता। इसलिए न्यायिक प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट, कट्टाक्काडा को निर्देश दिया गया कि वे C.P. No. 185 of 2024 में विष्णु की जमानत याचिका पर विचार करें और जहां तक संभव हो, उसी दिन आदेश पारित करें जिस दिन याचिका दाखिल हो।
केस: विष्णु बनाम केरल राज्य
केस का प्रकार: आपराधिक विविध मामला (Crl.M.C.)
केस संख्या: Crl.M.C. संख्या 6925/2025
अपराध संख्या: अपराध संख्या 27/2024, कट्टक्कड़ा आबकारी रेंज कार्यालय, तिरुवनंतपुरम
याचिकाकर्ता (आरोपी): विष्णु, 36 वर्ष, चंद्रमंगलम, तिरुवनंतपुरम निवासी
प्रतिवादी: केरल राज्य, केरल उच्च न्यायालय के लोक अभियोजक द्वारा प्रतिनिधित्व